13. क्षमा – शिक्षण

क्षमा एक सुंदर उपहार है।  जब कोई जिसने पाप किया है, मन फिराता है और जिसके साथ पाप किया गया है वह क्षमा कर देता है, तो दोनों के बीच…
13. क्षमा - शिक्षण

क्षमा एक सुंदर उपहार है।  जब कोई जिसने पाप किया है, मन फिराता है और जिसके साथ पाप किया गया है वह क्षमा कर देता है, तो दोनों के बीच मेल-मिलाप हो जाता है और दोनों शांति और आनंद का अनुभव करते हैं।

इस आनंद को जानने की ओर पहला कदम यह पहचानना है कि हमें कितना अधिक क्षमा किया गया है। यीशु हमें सिखाते हैं कि हमें अपने पापों के लिए परमेश्वर से क्षमा माँगनी चाहिए, जिन्हें वह अपराध के रूप में व्यक्त करते हैं। “और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।” (मत्ती 6:12; लूका 11:4 भी देखें)।

हम सब के ऊपर अपराध हैं।

हम सभी रिश्तों के एक जाल में रहते हैं जिसमें हमारी जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य होते हैं। केवल परमेश्वर ही इस संबंधों के जाल से बाहर है।  परमेश्वर किसी का ऋणी नहीं है, परन्तु परमेश्वर के प्रति और दूसरों के प्रति हमारा एक दायित्व है, जिसे एक ही शब्द में कहा जा सकता है: प्रेम।

“तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्‍ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।” (लूका 10:27)

जब हम अपने पापों के बारे में सोचते हैं, तो आमतौर पर सबसे पहले उन गलत कामों के बारे में सोचते हैं जो हमने किए हैं। परन्तु यहाँ असली बात यह है कि हम वह करने में चूक गए जो हमें करना चाहिए था। हम परमेश्वर के प्रति प्रतिदिन समर्पित प्रेम का जीवन जीने के ऋणी हैं, और जो हम पर बकाया था, उसे हमने अदा नहीं किया है।
हमारा अपने पड़ोसियों के प्रति यह कर्तव्य है कि हम सदा उनकी भलाई चाहें। हम अपने पतियों, पत्नियों, माता-पिता, बच्चों, मित्रों, सहकर्मियों, और यहाँ तक कि अपने शत्रुओं के प्रति प्रेम का ऋण रखते हैं। और चाहे हम कितना भी प्रेम करें, वह ऋण कभी पूरी तरह नहीं चुकाया जाता।

हम सब के ऋणी भी हैं।

“ऋणी ” का अर्थ है कि आपके जीवन में ऐसे लोग होंगे जो आपको वह नहीं देंगे जो वे आपको देने के लिए बाध्य हैं।  हम एक पतित संसार में रहते हैं, और जैसे आपने परमेश्वर और दूसरों के प्रति अपने दायित्वों में चूक की है, वैसे ही दूसरे लोग भी परमेश्वर और आपके प्रति अपने दायित्वों में चूक करेंगे।

परमेश्वर हमें बुलाता है कि हम उन लोगों को क्षमा करें जिन्होंने हमारे साथ अन्याय किया है, हमारा साथ नहीं दिया है और हमें निराश किया है, जैसे उसने हमें क्षमा किया है:

एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्‍वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो। (इफिसियों 4:32)

इसलिए दूसरों को क्षमा करने का आधार वह क्षमा है जो हमें प्राप्त हुई है।

हम कैसे क्षमा प्राप्त कर सकते हैं?

यीशु हमें यह प्रार्थना करना सिखाते हैं: “हमारे अपराधों को क्षमा कर” (मत्ती 6:12)। यह एक बड़ी माँग है। कल्पना कीजिए कि आप किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाते हैं, जिसके आप 80 लाख रुपये के ऋणी हैं, और आप कहते हैं, “मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप इस कर्ज को माफ कर दें।” परन्तु यीशु हमें परमेश्वर से इससे भी बड़ी माँग करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

जब हम परमेश्वर से अपने पापों को क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं, तो हम उसके पास खाली हाथों आते हैं। हम परमेश्वर के साथ कोई सौदा करने का प्रयास नहीं करते: “हे पिता, मैं एक अच्छी माँ, एक अच्छा विद्यार्थी, या एक अच्छा मसीही बनकर तुझे चुका दूँगा।” इसके बजाय, हम कहते हैं, “हे पिता, मैं चुका नहीं सकता। मैं तेरी दया की याचना करता हूँ। मेरे अपराधों को क्षमा कर, मेरा लेखा साफ कर दे, और जो मुझ पर बकाया है उसे मिटा दे।”

एक न्यायी और पवित्र परमेश्वर हमारी उन बार-बार की असफलताओं को किस प्रकार क्षमा कर सकता है जो उसकी आज्ञाओं का पालन करने में हुई हैं? यह प्रश्न हमें बाइबल की कहानी के केन्द्र तक ले जाता है। यीशु ने वह किया जो हम करने में असफल रहे हैं। उसने सिद्ध प्रेम का जीवन जिया। उसने वह सब पूरा किया जो परमेश्वर हमसे चाहता है, और फिर हमारे लिए अपना सिद्ध जीवन अर्पित कर दिया। यीशु ने वह ऋण चुका दिया जो हम पर था।

जब हम विश्वास और मन फिराव के साथ उसके पुत्र यीशु की ओर देखते हैं, तब परमेश्वर पापियों को क्षमा करता है।

“और उनसे कहा, “यों लिखा है कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा, और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।” (लूका 24:46-47)

कल्पना कीजिए कि आप मन फिराकर परमेश्वर के पास आए, और वह आपसे कहे: “तुम अभी परीक्षा काल में हो, और समय ही बताएगा कि तुम्हारा मन फिराव सच्चा है या नहीं।” अब आपको अपने आप को सिद्ध करना होगा, यह जानते हुए कि यदि आप असफल हुए, तो परमेश्वर आपके विरोध में खड़ा होगा। यह एक असहनीय बोझ होता।

परन्तु यीशु के पास आपके लिए केवल परीक्षा काल में रखने से भी कहीं उत्तम बात है। जब आप मन फिराकर उसके पास आते हो, तो वह आपको “निर्दोष” ठहराता है। वह क्षमा करता है। वह मेल स्थापित कराता है। और क्षमा, परीक्षा काल से कहीं अधिक उत्तम है!

यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्‍वासयोग्य और धर्मी है। (1 यूहन्ना 1:9)

जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊँचा है,

वैसे ही उसकी करुणा उसके डरवैयों

के ऊपर प्रबल है।

उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है,

उसने हमारे अपराधों को हम से

उतनी ही दूर कर दिया है।

(भजन संहिता 103:11-12)

अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। (रोमियों 8:1)

क्षमा यह नहीं है कि परमेश्वर आपको अपने आप को सिद्ध करने का अवसर दे। क्षमा यह है कि परमेश्वर आपके विरुद्ध सब आरोप हटा देता है और आपका लेखा सदा के लिए मिटा देता है।

हम क्षमा किस प्रकार कर सकते हैं?

क्षमा करना कभी सरल नहीं होता। परन्तु यदि आप किसी अन्य व्यक्ति को क्षमा करने में संघर्ष कर रहे हैं, तो शुभ समाचार यह है कि परमेश्वर की क्षमा को प्राप्त करना आपको दूसरों को क्षमा करने की नई सामर्थ्य देगा।

यीशु ने हमें यह प्रार्थना करना सिखाया: “और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर” (मत्ती 6:12)। इसका अर्थ है कि परमेश्वर से क्षमा प्राप्त करने और दूसरों को क्षमा देने के बीच अत्यन्त गहरा संबंध है। यह संबंध “हम” और “हमारे” इन शब्दों में निहित है। यह प्रार्थना “मेरे अपराधों को क्षमा कर” नहीं है, बल्कि “हमारे अपराधों को क्षमा कर” है।”

इस प्रार्थना को करते समय आप परमेश्वर से न केवल अपने अपराधों को क्षमा करने की विनती करते हैं, बल्कि उन अपराधों को भी क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं जो दूसरों ने आपके विरुद्ध किए हैं। “हे पिता, हमें क्षमा कर” का अर्थ है, “मुझे क्षमा कर, क्योंकि मैं तुझ से प्रेम करने में असफल रहा हूँ; और उसे भी क्षमा कर, क्योंकि वह मुझ से प्रेम करने में असफल रही है।” इसका एकमात्र दूसरा विकल्प यह होगा: “हे पिता, हमें क्षमा न कर। मैं क्षमा नहीं करूँगा, और मैं नहीं चाहता कि तू भी क्षमा करे।” परन्तु कौन ऐसी प्रार्थना करना चाहेगा? जब परमेश्वर आपका हृदय खोलता है कि आप क्षमा को उंडेलें, तब वही हृदय उसके लिए भी खुला होता है कि वह उसमें अपनी क्षमा उंडेले।

चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न

1- क्षमा के उपहार पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?

2- आप परमेश्वर के प्रति अपने ऋण का वर्णन कैसे करेंगे?

3- 1 (बहुत कम) से 10 (पूरा) के पैमाने पर, परमेश्वर ने आपके कितने अपराधों को क्षमा किया है? क्यों?

4- क्या आपको इस समय किसी को क्षमा करने में कठिनाई हो रही है?

5- यदि आप विश्वास और पश्चाताप के साथ परमेश्वर के पास आएं, तो आपको क्या लगता है कि परमेश्वर कैसे प्रतिक्रिया देंगे? क्यों?

Series : बाइबल का अवलोकन

13. क्षमा – शिक्षण

क्षमा एक सुंदर उपहार है।  जब कोई जिसने पाप किया है, मन फिराता है और जिसके साथ पाप किया गया है वह क्षमा कर देता है, तो दोनों के बीच…
13. क्षमा - शिक्षण

क्षमा एक सुंदर उपहार है।  जब कोई जिसने पाप किया है, मन फिराता है और जिसके साथ पाप किया गया है वह क्षमा कर देता है, तो दोनों के बीच मेल-मिलाप हो जाता है और दोनों शांति और आनंद का अनुभव करते हैं।

इस आनंद को जानने की ओर पहला कदम यह पहचानना है कि हमें कितना अधिक क्षमा किया गया है। यीशु हमें सिखाते हैं कि हमें अपने पापों के लिए परमेश्वर से क्षमा माँगनी चाहिए, जिन्हें वह अपराध के रूप में व्यक्त करते हैं। “और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।” (मत्ती 6:12; लूका 11:4 भी देखें)।

हम सब के ऊपर अपराध हैं।

हम सभी रिश्तों के एक जाल में रहते हैं जिसमें हमारी जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य होते हैं। केवल परमेश्वर ही इस संबंधों के जाल से बाहर है।  परमेश्वर किसी का ऋणी नहीं है, परन्तु परमेश्वर के प्रति और दूसरों के प्रति हमारा एक दायित्व है, जिसे एक ही शब्द में कहा जा सकता है: प्रेम।

“तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्‍ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।” (लूका 10:27)

जब हम अपने पापों के बारे में सोचते हैं, तो आमतौर पर सबसे पहले उन गलत कामों के बारे में सोचते हैं जो हमने किए हैं। परन्तु यहाँ असली बात यह है कि हम वह करने में चूक गए जो हमें करना चाहिए था। हम परमेश्वर के प्रति प्रतिदिन समर्पित प्रेम का जीवन जीने के ऋणी हैं, और जो हम पर बकाया था, उसे हमने अदा नहीं किया है।
हमारा अपने पड़ोसियों के प्रति यह कर्तव्य है कि हम सदा उनकी भलाई चाहें। हम अपने पतियों, पत्नियों, माता-पिता, बच्चों, मित्रों, सहकर्मियों, और यहाँ तक कि अपने शत्रुओं के प्रति प्रेम का ऋण रखते हैं। और चाहे हम कितना भी प्रेम करें, वह ऋण कभी पूरी तरह नहीं चुकाया जाता।

हम सब के ऋणी भी हैं।

“ऋणी ” का अर्थ है कि आपके जीवन में ऐसे लोग होंगे जो आपको वह नहीं देंगे जो वे आपको देने के लिए बाध्य हैं।  हम एक पतित संसार में रहते हैं, और जैसे आपने परमेश्वर और दूसरों के प्रति अपने दायित्वों में चूक की है, वैसे ही दूसरे लोग भी परमेश्वर और आपके प्रति अपने दायित्वों में चूक करेंगे।

परमेश्वर हमें बुलाता है कि हम उन लोगों को क्षमा करें जिन्होंने हमारे साथ अन्याय किया है, हमारा साथ नहीं दिया है और हमें निराश किया है, जैसे उसने हमें क्षमा किया है:

एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्‍वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो। (इफिसियों 4:32)

इसलिए दूसरों को क्षमा करने का आधार वह क्षमा है जो हमें प्राप्त हुई है।

हम कैसे क्षमा प्राप्त कर सकते हैं?

यीशु हमें यह प्रार्थना करना सिखाते हैं: “हमारे अपराधों को क्षमा कर” (मत्ती 6:12)। यह एक बड़ी माँग है। कल्पना कीजिए कि आप किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाते हैं, जिसके आप 80 लाख रुपये के ऋणी हैं, और आप कहते हैं, “मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप इस कर्ज को माफ कर दें।” परन्तु यीशु हमें परमेश्वर से इससे भी बड़ी माँग करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

जब हम परमेश्वर से अपने पापों को क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं, तो हम उसके पास खाली हाथों आते हैं। हम परमेश्वर के साथ कोई सौदा करने का प्रयास नहीं करते: “हे पिता, मैं एक अच्छी माँ, एक अच्छा विद्यार्थी, या एक अच्छा मसीही बनकर तुझे चुका दूँगा।” इसके बजाय, हम कहते हैं, “हे पिता, मैं चुका नहीं सकता। मैं तेरी दया की याचना करता हूँ। मेरे अपराधों को क्षमा कर, मेरा लेखा साफ कर दे, और जो मुझ पर बकाया है उसे मिटा दे।”

एक न्यायी और पवित्र परमेश्वर हमारी उन बार-बार की असफलताओं को किस प्रकार क्षमा कर सकता है जो उसकी आज्ञाओं का पालन करने में हुई हैं? यह प्रश्न हमें बाइबल की कहानी के केन्द्र तक ले जाता है। यीशु ने वह किया जो हम करने में असफल रहे हैं। उसने सिद्ध प्रेम का जीवन जिया। उसने वह सब पूरा किया जो परमेश्वर हमसे चाहता है, और फिर हमारे लिए अपना सिद्ध जीवन अर्पित कर दिया। यीशु ने वह ऋण चुका दिया जो हम पर था।

जब हम विश्वास और मन फिराव के साथ उसके पुत्र यीशु की ओर देखते हैं, तब परमेश्वर पापियों को क्षमा करता है।

“और उनसे कहा, “यों लिखा है कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा, और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।” (लूका 24:46-47)

कल्पना कीजिए कि आप मन फिराकर परमेश्वर के पास आए, और वह आपसे कहे: “तुम अभी परीक्षा काल में हो, और समय ही बताएगा कि तुम्हारा मन फिराव सच्चा है या नहीं।” अब आपको अपने आप को सिद्ध करना होगा, यह जानते हुए कि यदि आप असफल हुए, तो परमेश्वर आपके विरोध में खड़ा होगा। यह एक असहनीय बोझ होता।

परन्तु यीशु के पास आपके लिए केवल परीक्षा काल में रखने से भी कहीं उत्तम बात है। जब आप मन फिराकर उसके पास आते हो, तो वह आपको “निर्दोष” ठहराता है। वह क्षमा करता है। वह मेल स्थापित कराता है। और क्षमा, परीक्षा काल से कहीं अधिक उत्तम है!

यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्‍वासयोग्य और धर्मी है। (1 यूहन्ना 1:9)

जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊँचा है,

वैसे ही उसकी करुणा उसके डरवैयों

के ऊपर प्रबल है।

उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है,

उसने हमारे अपराधों को हम से

उतनी ही दूर कर दिया है।

(भजन संहिता 103:11-12)

अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। (रोमियों 8:1)

क्षमा यह नहीं है कि परमेश्वर आपको अपने आप को सिद्ध करने का अवसर दे। क्षमा यह है कि परमेश्वर आपके विरुद्ध सब आरोप हटा देता है और आपका लेखा सदा के लिए मिटा देता है।

हम क्षमा किस प्रकार कर सकते हैं?

क्षमा करना कभी सरल नहीं होता। परन्तु यदि आप किसी अन्य व्यक्ति को क्षमा करने में संघर्ष कर रहे हैं, तो शुभ समाचार यह है कि परमेश्वर की क्षमा को प्राप्त करना आपको दूसरों को क्षमा करने की नई सामर्थ्य देगा।

यीशु ने हमें यह प्रार्थना करना सिखाया: “और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर” (मत्ती 6:12)। इसका अर्थ है कि परमेश्वर से क्षमा प्राप्त करने और दूसरों को क्षमा देने के बीच अत्यन्त गहरा संबंध है। यह संबंध “हम” और “हमारे” इन शब्दों में निहित है। यह प्रार्थना “मेरे अपराधों को क्षमा कर” नहीं है, बल्कि “हमारे अपराधों को क्षमा कर” है।”

इस प्रार्थना को करते समय आप परमेश्वर से न केवल अपने अपराधों को क्षमा करने की विनती करते हैं, बल्कि उन अपराधों को भी क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं जो दूसरों ने आपके विरुद्ध किए हैं। “हे पिता, हमें क्षमा कर” का अर्थ है, “मुझे क्षमा कर, क्योंकि मैं तुझ से प्रेम करने में असफल रहा हूँ; और उसे भी क्षमा कर, क्योंकि वह मुझ से प्रेम करने में असफल रही है।” इसका एकमात्र दूसरा विकल्प यह होगा: “हे पिता, हमें क्षमा न कर। मैं क्षमा नहीं करूँगा, और मैं नहीं चाहता कि तू भी क्षमा करे।” परन्तु कौन ऐसी प्रार्थना करना चाहेगा? जब परमेश्वर आपका हृदय खोलता है कि आप क्षमा को उंडेलें, तब वही हृदय उसके लिए भी खुला होता है कि वह उसमें अपनी क्षमा उंडेले।

चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न

1- क्षमा के उपहार पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?

2- आप परमेश्वर के प्रति अपने ऋण का वर्णन कैसे करेंगे?

3- 1 (बहुत कम) से 10 (पूरा) के पैमाने पर, परमेश्वर ने आपके कितने अपराधों को क्षमा किया है? क्यों?

4- क्या आपको इस समय किसी को क्षमा करने में कठिनाई हो रही है?

5- यदि आप विश्वास और पश्चाताप के साथ परमेश्वर के पास आएं, तो आपको क्या लगता है कि परमेश्वर कैसे प्रतिक्रिया देंगे? क्यों?