7. प्रलोभित – शिक्षण

जब यीशु ने अपनी सार्वजनिक सेवा आरम्भ की, तब वह तीस वर्ष के थे। उन्होंने यरदन नदी में बपतिस्मा लिया और अपने आप को उन पुरुषों और स्त्रियों के साथ…
7. जन्म - शिक्षण

जब यीशु ने अपनी सार्वजनिक सेवा आरम्भ की, तब वह तीस वर्ष के थे। उन्होंने यरदन नदी में बपतिस्मा लिया और अपने आप को उन पुरुषों और स्त्रियों के साथ पूरी तरह जोड़ लिया जो परमेश्वर की महिमा के लिए जीना चाहते हैं। पवित्र आत्मा यीशु पर उतरा, और स्वर्ग से एक स्पष्ट वाणी आई, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ” (मत्ती 3:17)।

पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर यीशु जंगल में गए, जहाँ उन्होंने चालीस दिनों तक तीव्र प्रलोभन का सामना किया। यह महत्वपूर्ण है कि आत्मा यीशु को जंगल में ले गई। (लूका 4:1)। वे शत्रु का पीछा कर रहे थे। वे शैतान के कामों को नष्ट करने के लिए संसार में आए थे, और उनकी सार्वजनिक सेवा का पहला कदम हमारे शत्रु का सामना करना और वहाँ विजय पाना था जहाँ आदम असफल हुआ था।

भ्रम, अनुमान, और महत्वाकांक्षा

ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान के पास सीमित रणनीतियाँ ही हैं। यह बात अदन की वाटिका में आदम और हव्वा को प्रलोभन देने में उसकी सफलता और जंगल में प्रभु यीशु मसीह की सिद्धता को भ्रष्ट करने में उसकी पूरी असफलता के बीच की समानता से स्पष्ट होती है।

वाटिका में शैतान की पहली रणनीति परमेश्वर की कही हुई बात के विषय में भ्रम पैदा करना थी। उसने हव्वा से पूछा, “क्या सच है कि परमेश्‍वर ने कहा, ‘तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना’?” (उत्पत्ति 3:1)। जंगल में शैतान ने यीशु की पहचान के विषय में भ्रम पैदा करने की कोशिश की। उसने कहा, “यदि तू परमेश्‍वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।” (मत्ती 4:3)। परन्तु यीशु को यह सिद्ध करने के लिए कि वह परमेश्वर का पुत्र था और हैं, कोई चमत्कार करने की आवश्यकता नहीं थी। यीशु ने उत्तर दिया : “लिखा है, ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।’ ” (मत्ती 4:4)।

वाटिका में उनकी दूसरी रणनीति अनुमान को बढ़ावा देने का प्रयास थी। शैतान ने हव्वा को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करी कि वह परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन बिना किसी परिणाम के कर सकती है। उसने कहा, “तुम निश्‍चय न मरोगे” (उत्पत्ति 3:4)। उसने इसी प्रकार की दलील का उपयोग तब भी किया जब उसने यीशु को मंदिर के सबसे ऊँचे स्थान से अपने आप को नीचे फेंकने की चुनौती दी, यह वादा करते हुए कि परमेश्वर उसे पकड़ने के लिए एक स्वर्गदूत भेजेगा। ऐसा चमत्कारिक प्रदर्शन निश्चय ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता। परन्तु यीशु विश्वास और दुस्साहस के बीच का अंतर जानते थे: “यह भी लिखा है: ‘तू प्रभु अपने परमेश्‍वर की परीक्षा न कर’ ” (मत्ती 4:7)।

तीसरी रणनीति महत्वाकांक्षा पर केंद्रित थी। शैतान ने हव्वा से वादा किया कि यदि वह अपनी स्वतंत्रता का दावा करेगी तो वह परमेश्वर के समान होने की स्थिति में पहुँच जाएगी। उसने कहा, “परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे” (उत्पत्ति 3:5)। इस रणनीति में एक बार सफल होने के बाद, शत्रु ने यीशु के विरुद्ध भी वही तरीका अपनाया और मूलतः यह कहा, “यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा” (लूका 4:5-7)। परन्तु यीशु ने कहा, “हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है : ‘तू प्रभु अपने परमेश्‍वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर’” (मत्ती 4:10)।

शैतान ने यीशु के विरुद्ध अपने आक्रमण में जो कुछ उसके पास था सब लगा दिया, परन्तु वह उन्हें तोड़ नहीं सका। और जब उसने अपनी सारी रणनीति आजमा ली, तो उसके पास पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

शत्रु की पूरी शक्ति

केवल यीशु ही प्रलोभन की पूरी शक्ति को जानते हैं, क्योंकि केवल उन्होंने ही शत्रु के आक्रमण की पूरी शक्ति को सहा है।

कल्पना कीजिए कि युद्ध के दौरान तीन वायुसैनिक शत्रु के क्षेत्र के ऊपर जेट विमानों से उड़ान भर रहे हैं।  उन्हें मार गिराया जाता है, पकड़ लिया जाता है, और फिर पूछताछ के लिए शत्रु के पास ले जाया जाता है। एक-एक करके उन्हें एक अँधेरे कमरे में लाया जाता है।

पहला वायुसैनिक अपना नाम, पद और पहचान संख्या बताता है। उसके पकड़ने वाले उससे उसकी सेना की स्थिति के बारे में पूछते हैं।  वह जानता है कि उसे यह जानकारी नहीं देनी चाहिए, पर वह यह भी जानता है कि शत्रु क्रूर है। इसलिए वह उन्हें वह सब बता देता है जो वह जानता है।

दूसरे वायुसैनिक को अंदर लाया जाता है, और वे उससे पूछताछ शुरू करते हैं। वह हार मानने को तैयार नहीं होता। तब क्रूरता शुरू होती है और अंततः वह उस पर हावी हो जाती है। वह टूट जाता है और उन्हें वह बता देता है जो वह जानता है।

फिर तीसरा वायुसैनिक अंदर आता है। वह कहता है, “तुम मुझे नहीं तोड़ पाओगे।” वे कहते हैं, “ओ हाँ, हम तुम्हें तोड़ देंगे। हमने हर उस व्यक्ति को तोड़ दिया है जो कभी इस कमरे में आया है। यह केवल समय की बात है; तुम देखोगे।”

क्रूरता शुरू होती है, परन्तु वह नहीं टूटता।  फिर उसे और तीव्र किया जाता है, और फिर उससे भी अधिक तीव्र किया जाता है, यहाँ तक कि वह असहनीय लगने लगती है, फिर भी वह नहीं टूटता।

अंत में एक ऐसा समय आता है जब वे वह सब कुछ आज़मा चुके होते हैं जो वे जानते हैं। “इसका कोई फायदा नहीं,” वे कहते हैं। “यह उस किसी भी व्यक्ति जैसा नहीं है जिसे पहले इस कमरे में लाया गया है। हम इसे तोड़ नहीं सकते।”

इन वायुसैनिकों में से किसने शत्रु के पूरे आक्रमण को सहा?  शत्रु के आक्रमण की पूरी शक्ति को वास्तव में वही जानता है जो नहीं टूटा। इसलिए कभी यह मत सोचिए कि यीशु की परीक्षाएँ आपकी परीक्षाओं से कम थीं। यीशु प्रलोभन की पूरी शक्ति को जानते हैं, क्योंकि उन्होंने शत्रु के आक्रमण की पूरी शक्ति को सहा है।

जब आप प्रलोभित होते हैं, तो यीशु आपकी सहायता करने में सक्षम हैं। वे आपके प्रलोभनों को समझते हैं, क्योंकि वे स्वयं भी प्रलोभित हुए हैं, और वे आपको वह शक्ति दे सकते हैं जिसकी आपको अपनी लड़ाई में विजय पाने के लिए आवश्यकता है (इब्रानियों 4:15-16)।

वादा किया गया उद्धारकर्ता

यीशु पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में जंगल से लौटे और अपनी सार्वजनिक सेवकाई आरम्भ की। नाज़रेथ के आराधनालय में उन्होंने भविष्यवक्ता यशायाह के उन वचनों को पढ़ा, जो प्रतिज्ञा किए गए उद्धारकर्ता के विषय में थे:

प्रभु का आत्मा मुझ पर है,

इसलिये कि उसने कंगालों को सुसमाचार

सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है,

और मुझे इसलिये भेजा है कि बन्दियों

को छुटकारे का

और अंधों को दृष्‍टि

पाने का सुसमाचार प्रचार करूँ और

कुचले हुओं को छुड़ाऊँ,

और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूँ।” (लूका 4:18-19)

यीशु ने पुस्तक को लपेटकर सेवक को वापस दे दिया और बैठ गए। सबकी आँखें उन पर लगी हुई थीं, यह देखने के लिए कि वे क्या कहेंगे: तब वह उनसे कहने लगा, “आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है” (लूका 4:21)। आप सोच सकते हैं कि लोग परमेश्वर के प्रतिज्ञा किए हुए उद्धारकर्ता का स्वागत करेंगे, परन्तु इन लोगों की प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने उन्हें अपने नगर से बाहर निकाल दिया (लूका 4:29)।

इसके बाद तीन साल ऐसे रहे, जिनमें यीशु ने दूसरों की सेवा के द्वारा परमेश्वर की सेवा करने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। उनके चेलों ने प्रकृति पर उनकी सामर्थ्य देखी, जब उन्होंने आँधी को शांत किया; दुष्टात्माओं पर उनका अधिकार देखा, जब उन्होंने पीड़ितों को छुड़ाया; रोग पर उनकी शक्ति देखी, जब उन्होंने बीमारों को चंगा किया; और यहाँ तक कि मृत्यु पर भी उनका अधिकार देखा, जब उन्होंने मरे हुओं को जीवित किया। बहुतों ने उन पर विश्वास किया और उनके पीछे चले, परन्तु निरन्तर विरोध भी होता रहा, जो अन्ततः उनकी गिरफ़्तारी, मुकदमे और क्रूस पर चढ़ाए जाने तक पहुँचा।

चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न

1- यीशु की परीक्षाओं को देखकर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?

2- क्या आपने कभी महसूस किया है कि आप प्रलोभित हो रहे थे? क्या उस प्रलोभन में भ्रम, अनुमान या महत्वाकांक्षा शामिल थी?

3- शैतान की किन रणनीतियों के प्रति आप सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करते हैं? क्यों?

4- 1 (बिल्कुल भी मदद नहीं) से 10 (जितनी मदद चाहिए उतनी) के पैमाने पर, आपको क्या लगता है कि यीशु आपके प्रलोभनों में कितनी मदद कर सकते हैं? आपने ऐसा जवाब क्यों दिया?

5 –अगर आज यीशु आपके शहर में आकर चमत्कार करें, तो आपके शहर के लोग कैसी प्रतिक्रिया देंगे? क्यों?

Series : बाइबल का अवलोकन

7. प्रलोभित – शिक्षण

जब यीशु ने अपनी सार्वजनिक सेवा आरम्भ की, तब वह तीस वर्ष के थे। उन्होंने यरदन नदी में बपतिस्मा लिया और अपने आप को उन पुरुषों और स्त्रियों के साथ…
7. जन्म - शिक्षण

जब यीशु ने अपनी सार्वजनिक सेवा आरम्भ की, तब वह तीस वर्ष के थे। उन्होंने यरदन नदी में बपतिस्मा लिया और अपने आप को उन पुरुषों और स्त्रियों के साथ पूरी तरह जोड़ लिया जो परमेश्वर की महिमा के लिए जीना चाहते हैं। पवित्र आत्मा यीशु पर उतरा, और स्वर्ग से एक स्पष्ट वाणी आई, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ” (मत्ती 3:17)।

पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर यीशु जंगल में गए, जहाँ उन्होंने चालीस दिनों तक तीव्र प्रलोभन का सामना किया। यह महत्वपूर्ण है कि आत्मा यीशु को जंगल में ले गई। (लूका 4:1)। वे शत्रु का पीछा कर रहे थे। वे शैतान के कामों को नष्ट करने के लिए संसार में आए थे, और उनकी सार्वजनिक सेवा का पहला कदम हमारे शत्रु का सामना करना और वहाँ विजय पाना था जहाँ आदम असफल हुआ था।

भ्रम, अनुमान, और महत्वाकांक्षा

ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान के पास सीमित रणनीतियाँ ही हैं। यह बात अदन की वाटिका में आदम और हव्वा को प्रलोभन देने में उसकी सफलता और जंगल में प्रभु यीशु मसीह की सिद्धता को भ्रष्ट करने में उसकी पूरी असफलता के बीच की समानता से स्पष्ट होती है।

वाटिका में शैतान की पहली रणनीति परमेश्वर की कही हुई बात के विषय में भ्रम पैदा करना थी। उसने हव्वा से पूछा, “क्या सच है कि परमेश्‍वर ने कहा, ‘तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना’?” (उत्पत्ति 3:1)। जंगल में शैतान ने यीशु की पहचान के विषय में भ्रम पैदा करने की कोशिश की। उसने कहा, “यदि तू परमेश्‍वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।” (मत्ती 4:3)। परन्तु यीशु को यह सिद्ध करने के लिए कि वह परमेश्वर का पुत्र था और हैं, कोई चमत्कार करने की आवश्यकता नहीं थी। यीशु ने उत्तर दिया : “लिखा है, ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।’ ” (मत्ती 4:4)।

वाटिका में उनकी दूसरी रणनीति अनुमान को बढ़ावा देने का प्रयास थी। शैतान ने हव्वा को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करी कि वह परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन बिना किसी परिणाम के कर सकती है। उसने कहा, “तुम निश्‍चय न मरोगे” (उत्पत्ति 3:4)। उसने इसी प्रकार की दलील का उपयोग तब भी किया जब उसने यीशु को मंदिर के सबसे ऊँचे स्थान से अपने आप को नीचे फेंकने की चुनौती दी, यह वादा करते हुए कि परमेश्वर उसे पकड़ने के लिए एक स्वर्गदूत भेजेगा। ऐसा चमत्कारिक प्रदर्शन निश्चय ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता। परन्तु यीशु विश्वास और दुस्साहस के बीच का अंतर जानते थे: “यह भी लिखा है: ‘तू प्रभु अपने परमेश्‍वर की परीक्षा न कर’ ” (मत्ती 4:7)।

तीसरी रणनीति महत्वाकांक्षा पर केंद्रित थी। शैतान ने हव्वा से वादा किया कि यदि वह अपनी स्वतंत्रता का दावा करेगी तो वह परमेश्वर के समान होने की स्थिति में पहुँच जाएगी। उसने कहा, “परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे” (उत्पत्ति 3:5)। इस रणनीति में एक बार सफल होने के बाद, शत्रु ने यीशु के विरुद्ध भी वही तरीका अपनाया और मूलतः यह कहा, “यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा” (लूका 4:5-7)। परन्तु यीशु ने कहा, “हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है : ‘तू प्रभु अपने परमेश्‍वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर’” (मत्ती 4:10)।

शैतान ने यीशु के विरुद्ध अपने आक्रमण में जो कुछ उसके पास था सब लगा दिया, परन्तु वह उन्हें तोड़ नहीं सका। और जब उसने अपनी सारी रणनीति आजमा ली, तो उसके पास पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

शत्रु की पूरी शक्ति

केवल यीशु ही प्रलोभन की पूरी शक्ति को जानते हैं, क्योंकि केवल उन्होंने ही शत्रु के आक्रमण की पूरी शक्ति को सहा है।

कल्पना कीजिए कि युद्ध के दौरान तीन वायुसैनिक शत्रु के क्षेत्र के ऊपर जेट विमानों से उड़ान भर रहे हैं।  उन्हें मार गिराया जाता है, पकड़ लिया जाता है, और फिर पूछताछ के लिए शत्रु के पास ले जाया जाता है। एक-एक करके उन्हें एक अँधेरे कमरे में लाया जाता है।

पहला वायुसैनिक अपना नाम, पद और पहचान संख्या बताता है। उसके पकड़ने वाले उससे उसकी सेना की स्थिति के बारे में पूछते हैं।  वह जानता है कि उसे यह जानकारी नहीं देनी चाहिए, पर वह यह भी जानता है कि शत्रु क्रूर है। इसलिए वह उन्हें वह सब बता देता है जो वह जानता है।

दूसरे वायुसैनिक को अंदर लाया जाता है, और वे उससे पूछताछ शुरू करते हैं। वह हार मानने को तैयार नहीं होता। तब क्रूरता शुरू होती है और अंततः वह उस पर हावी हो जाती है। वह टूट जाता है और उन्हें वह बता देता है जो वह जानता है।

फिर तीसरा वायुसैनिक अंदर आता है। वह कहता है, “तुम मुझे नहीं तोड़ पाओगे।” वे कहते हैं, “ओ हाँ, हम तुम्हें तोड़ देंगे। हमने हर उस व्यक्ति को तोड़ दिया है जो कभी इस कमरे में आया है। यह केवल समय की बात है; तुम देखोगे।”

क्रूरता शुरू होती है, परन्तु वह नहीं टूटता।  फिर उसे और तीव्र किया जाता है, और फिर उससे भी अधिक तीव्र किया जाता है, यहाँ तक कि वह असहनीय लगने लगती है, फिर भी वह नहीं टूटता।

अंत में एक ऐसा समय आता है जब वे वह सब कुछ आज़मा चुके होते हैं जो वे जानते हैं। “इसका कोई फायदा नहीं,” वे कहते हैं। “यह उस किसी भी व्यक्ति जैसा नहीं है जिसे पहले इस कमरे में लाया गया है। हम इसे तोड़ नहीं सकते।”

इन वायुसैनिकों में से किसने शत्रु के पूरे आक्रमण को सहा?  शत्रु के आक्रमण की पूरी शक्ति को वास्तव में वही जानता है जो नहीं टूटा। इसलिए कभी यह मत सोचिए कि यीशु की परीक्षाएँ आपकी परीक्षाओं से कम थीं। यीशु प्रलोभन की पूरी शक्ति को जानते हैं, क्योंकि उन्होंने शत्रु के आक्रमण की पूरी शक्ति को सहा है।

जब आप प्रलोभित होते हैं, तो यीशु आपकी सहायता करने में सक्षम हैं। वे आपके प्रलोभनों को समझते हैं, क्योंकि वे स्वयं भी प्रलोभित हुए हैं, और वे आपको वह शक्ति दे सकते हैं जिसकी आपको अपनी लड़ाई में विजय पाने के लिए आवश्यकता है (इब्रानियों 4:15-16)।

वादा किया गया उद्धारकर्ता

यीशु पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में जंगल से लौटे और अपनी सार्वजनिक सेवकाई आरम्भ की। नाज़रेथ के आराधनालय में उन्होंने भविष्यवक्ता यशायाह के उन वचनों को पढ़ा, जो प्रतिज्ञा किए गए उद्धारकर्ता के विषय में थे:

प्रभु का आत्मा मुझ पर है,

इसलिये कि उसने कंगालों को सुसमाचार

सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है,

और मुझे इसलिये भेजा है कि बन्दियों

को छुटकारे का

और अंधों को दृष्‍टि

पाने का सुसमाचार प्रचार करूँ और

कुचले हुओं को छुड़ाऊँ,

और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूँ।” (लूका 4:18-19)

यीशु ने पुस्तक को लपेटकर सेवक को वापस दे दिया और बैठ गए। सबकी आँखें उन पर लगी हुई थीं, यह देखने के लिए कि वे क्या कहेंगे: तब वह उनसे कहने लगा, “आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है” (लूका 4:21)। आप सोच सकते हैं कि लोग परमेश्वर के प्रतिज्ञा किए हुए उद्धारकर्ता का स्वागत करेंगे, परन्तु इन लोगों की प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने उन्हें अपने नगर से बाहर निकाल दिया (लूका 4:29)।

इसके बाद तीन साल ऐसे रहे, जिनमें यीशु ने दूसरों की सेवा के द्वारा परमेश्वर की सेवा करने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। उनके चेलों ने प्रकृति पर उनकी सामर्थ्य देखी, जब उन्होंने आँधी को शांत किया; दुष्टात्माओं पर उनका अधिकार देखा, जब उन्होंने पीड़ितों को छुड़ाया; रोग पर उनकी शक्ति देखी, जब उन्होंने बीमारों को चंगा किया; और यहाँ तक कि मृत्यु पर भी उनका अधिकार देखा, जब उन्होंने मरे हुओं को जीवित किया। बहुतों ने उन पर विश्वास किया और उनके पीछे चले, परन्तु निरन्तर विरोध भी होता रहा, जो अन्ततः उनकी गिरफ़्तारी, मुकदमे और क्रूस पर चढ़ाए जाने तक पहुँचा।

चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न

1- यीशु की परीक्षाओं को देखकर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?

2- क्या आपने कभी महसूस किया है कि आप प्रलोभित हो रहे थे? क्या उस प्रलोभन में भ्रम, अनुमान या महत्वाकांक्षा शामिल थी?

3- शैतान की किन रणनीतियों के प्रति आप सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करते हैं? क्यों?

4- 1 (बिल्कुल भी मदद नहीं) से 10 (जितनी मदद चाहिए उतनी) के पैमाने पर, आपको क्या लगता है कि यीशु आपके प्रलोभनों में कितनी मदद कर सकते हैं? आपने ऐसा जवाब क्यों दिया?

5 –अगर आज यीशु आपके शहर में आकर चमत्कार करें, तो आपके शहर के लोग कैसी प्रतिक्रिया देंगे? क्यों?