6. जन्म – शिक्षण

यीशु का जन्म इस बात का पहला प्रमाण था कि वह उन सभी व्यक्तियों से भिन्न हैं जो कभी भी इस संसार में जीवित रहे हैं। यह इस प्रकार हुआ: मरियम एक युवा स्त्री थी जो यूसुफ नाम के एक पुरुष से विवाह करने की तैयारी कर रही थी। परमेश्वर ने उससे एक स्वर्गदूत के द्वारा बात की, जो उसके पास प्रकट हुआ और कहा,
“हे मरियम, भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है। देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।” (लूका 1:30-31)
मरियम कुंवारी थी, इसलिए उसने पूछा, “यह कैसे होगा?” (पद 34)। स्वर्गदूत का उत्तर हमें एक अद्भुत रहस्य के केंद्र तक ले जाता है।
“पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी; इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।” (लूका 1:35)
मरियम स्वर्गदूत की कही हुई सारी बातें पूरी तरह समझ नहीं सकी, परन्तु विश्वास के साथ उसने स्वयं को परमेश्वर की योजना के अधीन कर दिया: “देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो” (लूका 1:38)।
यीशु के जन्म से कुछ समय पहले, कैसर ऑगस्टस ने एक आदेश जारी किया कि देश के सभी लोगों को अपने जन्मस्थान में जाकर पंजीकरण कराना होगा। इसका अर्थ यह था कि मरियम और यूसुफ को बैतलहम की यात्रा करनी पड़ी। छोटे से उस नगर के सभी सराय पहले ही भर चुके थे, इसलिए मरियम और यूसुफ को जानवरों के रहने के स्थान में शरण मिली, और वहीं यीशु का जन्म हुआ।
और उसने अपने पहलौठे पुत्र को जन्म दिया, और उसे कपड़ों में लपेटकर चरनी में लिटाया, क्योंकि सराय में उनके लिए कोई स्थान नहीं था। (लूका 2:7)
यीशु उद्धारकर्ता और राजा हैं
दुनिया शायद यीशु के जन्म को अनदेखा कर देती, यदि दो घटनाएँ न हुई होतीं।
पहला, एक स्वर्गदूत चरवाहों के पास प्रकट हुआ और कहा,
“मत डरो; क्योंकि देखो, मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिये होगा, कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है।” (लूका 2:10-11)
चरवाहे शीघ्र बैतलहम पहुँचे, जहाँ उन्होंने मरियम, यूसुफ और बालक को पाया, और उनसे मिलने के बाद उन्होंने जो शुभ समाचार सुना था, उसे जितने लोगों को बता सकते थे, सबको बताया।
जिन लोगों ने उनकी बातें सुनीं, वे “चरवाहों की कही हुई बातों पर आश्चर्य करने लगे” (लूका 2:18)। क्या होगा यदि यह सच हो? यह एक अच्छी शुरुआत है। यदि परमेश्वर ने एक उद्धारकर्ता भेजा है, तो आपके लिए आशा है। आप परमेश्वर के साथ शांति पा सकते हैं। आपके पाप और असफलताएँ अंत नहीं हैं। आपको क्षमा मिल सकती है। आपको बचाया जा सकता है।
दूसरा, पूरब से ज्योतिषी उस तारे का पीछा करते हुए आए जो यीशु के जन्म के समय प्रकट हुआ था। जब वे यरूशलेम पहुँचे, तो उन्होंने पूछा:
“यहूदियों का राजा जिसका जन्म हुआ है, कहाँ है? क्योंकि हमने पूर्व में उसका तारा देखा है और उसको प्रणाम करने आए हैं।” (मत्ती 2:2)
ये ज्योतिषी सम्भवतः राजा थे, और उन्होंने अपने ऊपर यीशु के अधिकार को पहचाना। यीशु राजा हैं, और राजाओं ने भी उनकी आराधना की।
तो, यीशु के राजा होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि हमें क्या विश्वास करना चाहिए और हमें कैसे जीवन जीना चाहिए, यह निर्देश देने का अधिकार उनके पास है। परन्तु जहाँ पूरब के राजा उनकी आराधना कर रहे थे, वहीं राजा हेरोदेस उन्हें नष्ट करने के लिए इतना दृढ़ था कि उसने बैतलहम और उसके आसपास के क्षेत्र में सभी बालकों को मरवा देने का आदेश दे दिया।
लोग आज भी यीशु के विषय में बँटे हुए हैं। कुछ लोग उन्हें उद्धारकर्ता के रूप में मानते हैं और राजा के रूप में उनकी आराधना करते हैं; जबकि अन्य लोग उनके उद्धार की आवश्यकता नहीं समझते और अपने जीवन पर उनके अधिकार का विरोध करके उनके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। यह स्थिति उनके जन्म के समय से ही बनी हुई है।
तो यीशु को हर एक जीवन पर शासन करने का अधिकार क्यों है?
यीशु परमेश्वर हैं।
स्वर्गदूत ने मरियम से घोषणा की कि उसका बालक “परमेश्वर का पुत्र” कहलाएगा (लूका 1:35)। फिर यूसुफ को अलग से प्रकट होकर बताया गया कि यीशु इम्मानुएल कहलाएगा, जिसका अर्थ है “परमेश्वर हमारे साथ” (मत्ती 1:23)।
मरियम कुंवारी थी, और उसका पुत्र परमेश्वर की सीधी पहल के परिणामस्वरूप जन्मा। यूसुफ का इसमें बिल्कुल भी कोई योगदान नहीं था। मरियम के गर्भ में जीवन पवित्र आत्मा के सृजनात्मक कार्य के द्वारा आया। परमेश्वर ने मानव जाति में से किसी उद्धारकर्ता के उत्पन्न होने की प्रतीक्षा नहीं की। वह स्वयं मानव जाति के पास आया। परमेश्वर मनुष्य बन गया और उसने मरियम से देह धारण की।
आपका जीवन तब शुरू हुआ जब आप अपनी माँ के गर्भ में ठहरे। उस क्षण से पहले आपका अस्तित्व नहीं था। परन्तु यीशु के साथ ऐसा नहीं था। उनका जीवन मरियम के गर्भ में आरम्भ नहीं हुआ। गोशाला में जन्म लेने से पहले वह स्वर्ग में पिता परमेश्वर के साथ जीवन साझा कर रहे थे।
यीशु ने सदा से पिता की महिमा और पिता के प्रेम को साझा किया है (यूहन्ना 17:5, 24), परन्तु
यद्यपि वह परमेश्वर के स्वरूप में था, तौभी (उसने) परमेश्वर के तुल्य होने को पकड़े रहने की वस्तु न समझा; परन्तु अपने आप को शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण करके मनुष्यों के समान बन गया। (फिलिप्पियों 2:6–7)
यीशु मनुष्य हैं।
हम कभी पूरी तरह समझ नहीं पाएँगे कि परमेश्वर ने कैसे मानवीय देह धारण की और एक शिशु के रूप में जन्म लिया, परन्तु नए नियम का मुख्य दावा यही है कि उन्होंने ऐसा किया। और यही बात उन्हें हमारा उद्धारकर्ता होने के योग्य बनाती है।
दो अलग हो चुके पक्षों के बीच एक मध्यस्थ की कल्पना कीजिए। वह एक हाथ उस व्यक्ति के कंधे पर रखता है जिसे ठेस पहुँची है और दूसरा हाथ उस पर जिसने ठेस पहुँचाई है, और इस प्रकार दोनों को फिर से मिला देता है। यीशु परमेश्वर और हमारे बीच वही मध्यस्थ हैं (1 तीमुथियुस 2:5)। यीशु हमें उद्धार देने में सक्षम है क्योंकि वह परमेश्वर के साथ एक है और हमारे साथ भी एक है।
परमेश्वर मनुष्य कैसे बना, यह चमत्कार एक अगम्य रहस्य है, परन्तु यही बात बाइबल में यीशु के विषय में बताई गई बाकी सभी बातों को समझने योग्य बनाती है। यदि परमेश्वर यीशु में मनुष्य बना, तो उसके दावे, उसके चमत्कार और उसका पुनरुत्थान आश्चर्य की बात नहीं होने चाहिए। अवतार ही वह रहस्य है जो बाकी सब बातों को स्पष्ट करता है।
चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न
1- यह सुनकर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी कि यीशु का जन्म एक कुंवारी माता से हुआ था?
2- स्वर्गदूतों ने कहा कि यीशु का जन्म सभी लोगों के लिए बड़ी खुशी का शुभ समाचार है। क्या यह आपको भी शुभ समाचार लगता है?
3- यीशु के प्रति लोगों में अभी भी मतभेद हैं। आपने उनके बारे में क्या-क्या प्रतिक्रियाएं देखी हैं?
4- क्या आपको यीशु के बारे में अपने दिल में तनाव या विभाजन महसूस होता है? आपको क्या लगता है कि ऐसा क्यों हो सकता है?
5- क्या आपको लगता है कि यीशु को आपके जीवन पर शासन करने का अधिकार है? क्यों या क्यों नहीं?
6. जन्म – शिक्षण

यीशु का जन्म इस बात का पहला प्रमाण था कि वह उन सभी व्यक्तियों से भिन्न हैं जो कभी भी इस संसार में जीवित रहे हैं। यह इस प्रकार हुआ: मरियम एक युवा स्त्री थी जो यूसुफ नाम के एक पुरुष से विवाह करने की तैयारी कर रही थी। परमेश्वर ने उससे एक स्वर्गदूत के द्वारा बात की, जो उसके पास प्रकट हुआ और कहा,
“हे मरियम, भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है। देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।” (लूका 1:30-31)
मरियम कुंवारी थी, इसलिए उसने पूछा, “यह कैसे होगा?” (पद 34)। स्वर्गदूत का उत्तर हमें एक अद्भुत रहस्य के केंद्र तक ले जाता है।
“पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी; इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।” (लूका 1:35)
मरियम स्वर्गदूत की कही हुई सारी बातें पूरी तरह समझ नहीं सकी, परन्तु विश्वास के साथ उसने स्वयं को परमेश्वर की योजना के अधीन कर दिया: “देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो” (लूका 1:38)।
यीशु के जन्म से कुछ समय पहले, कैसर ऑगस्टस ने एक आदेश जारी किया कि देश के सभी लोगों को अपने जन्मस्थान में जाकर पंजीकरण कराना होगा। इसका अर्थ यह था कि मरियम और यूसुफ को बैतलहम की यात्रा करनी पड़ी। छोटे से उस नगर के सभी सराय पहले ही भर चुके थे, इसलिए मरियम और यूसुफ को जानवरों के रहने के स्थान में शरण मिली, और वहीं यीशु का जन्म हुआ।
और उसने अपने पहलौठे पुत्र को जन्म दिया, और उसे कपड़ों में लपेटकर चरनी में लिटाया, क्योंकि सराय में उनके लिए कोई स्थान नहीं था। (लूका 2:7)
यीशु उद्धारकर्ता और राजा हैं
दुनिया शायद यीशु के जन्म को अनदेखा कर देती, यदि दो घटनाएँ न हुई होतीं।
पहला, एक स्वर्गदूत चरवाहों के पास प्रकट हुआ और कहा,
“मत डरो; क्योंकि देखो, मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिये होगा, कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है।” (लूका 2:10-11)
चरवाहे शीघ्र बैतलहम पहुँचे, जहाँ उन्होंने मरियम, यूसुफ और बालक को पाया, और उनसे मिलने के बाद उन्होंने जो शुभ समाचार सुना था, उसे जितने लोगों को बता सकते थे, सबको बताया।
जिन लोगों ने उनकी बातें सुनीं, वे “चरवाहों की कही हुई बातों पर आश्चर्य करने लगे” (लूका 2:18)। क्या होगा यदि यह सच हो? यह एक अच्छी शुरुआत है। यदि परमेश्वर ने एक उद्धारकर्ता भेजा है, तो आपके लिए आशा है। आप परमेश्वर के साथ शांति पा सकते हैं। आपके पाप और असफलताएँ अंत नहीं हैं। आपको क्षमा मिल सकती है। आपको बचाया जा सकता है।
दूसरा, पूरब से ज्योतिषी उस तारे का पीछा करते हुए आए जो यीशु के जन्म के समय प्रकट हुआ था। जब वे यरूशलेम पहुँचे, तो उन्होंने पूछा:
“यहूदियों का राजा जिसका जन्म हुआ है, कहाँ है? क्योंकि हमने पूर्व में उसका तारा देखा है और उसको प्रणाम करने आए हैं।” (मत्ती 2:2)
ये ज्योतिषी सम्भवतः राजा थे, और उन्होंने अपने ऊपर यीशु के अधिकार को पहचाना। यीशु राजा हैं, और राजाओं ने भी उनकी आराधना की।
तो, यीशु के राजा होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि हमें क्या विश्वास करना चाहिए और हमें कैसे जीवन जीना चाहिए, यह निर्देश देने का अधिकार उनके पास है। परन्तु जहाँ पूरब के राजा उनकी आराधना कर रहे थे, वहीं राजा हेरोदेस उन्हें नष्ट करने के लिए इतना दृढ़ था कि उसने बैतलहम और उसके आसपास के क्षेत्र में सभी बालकों को मरवा देने का आदेश दे दिया।
लोग आज भी यीशु के विषय में बँटे हुए हैं। कुछ लोग उन्हें उद्धारकर्ता के रूप में मानते हैं और राजा के रूप में उनकी आराधना करते हैं; जबकि अन्य लोग उनके उद्धार की आवश्यकता नहीं समझते और अपने जीवन पर उनके अधिकार का विरोध करके उनके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। यह स्थिति उनके जन्म के समय से ही बनी हुई है।
तो यीशु को हर एक जीवन पर शासन करने का अधिकार क्यों है?
यीशु परमेश्वर हैं।
स्वर्गदूत ने मरियम से घोषणा की कि उसका बालक “परमेश्वर का पुत्र” कहलाएगा (लूका 1:35)। फिर यूसुफ को अलग से प्रकट होकर बताया गया कि यीशु इम्मानुएल कहलाएगा, जिसका अर्थ है “परमेश्वर हमारे साथ” (मत्ती 1:23)।
मरियम कुंवारी थी, और उसका पुत्र परमेश्वर की सीधी पहल के परिणामस्वरूप जन्मा। यूसुफ का इसमें बिल्कुल भी कोई योगदान नहीं था। मरियम के गर्भ में जीवन पवित्र आत्मा के सृजनात्मक कार्य के द्वारा आया। परमेश्वर ने मानव जाति में से किसी उद्धारकर्ता के उत्पन्न होने की प्रतीक्षा नहीं की। वह स्वयं मानव जाति के पास आया। परमेश्वर मनुष्य बन गया और उसने मरियम से देह धारण की।
आपका जीवन तब शुरू हुआ जब आप अपनी माँ के गर्भ में ठहरे। उस क्षण से पहले आपका अस्तित्व नहीं था। परन्तु यीशु के साथ ऐसा नहीं था। उनका जीवन मरियम के गर्भ में आरम्भ नहीं हुआ। गोशाला में जन्म लेने से पहले वह स्वर्ग में पिता परमेश्वर के साथ जीवन साझा कर रहे थे।
यीशु ने सदा से पिता की महिमा और पिता के प्रेम को साझा किया है (यूहन्ना 17:5, 24), परन्तु
यद्यपि वह परमेश्वर के स्वरूप में था, तौभी (उसने) परमेश्वर के तुल्य होने को पकड़े रहने की वस्तु न समझा; परन्तु अपने आप को शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण करके मनुष्यों के समान बन गया। (फिलिप्पियों 2:6–7)
यीशु मनुष्य हैं।
हम कभी पूरी तरह समझ नहीं पाएँगे कि परमेश्वर ने कैसे मानवीय देह धारण की और एक शिशु के रूप में जन्म लिया, परन्तु नए नियम का मुख्य दावा यही है कि उन्होंने ऐसा किया। और यही बात उन्हें हमारा उद्धारकर्ता होने के योग्य बनाती है।
दो अलग हो चुके पक्षों के बीच एक मध्यस्थ की कल्पना कीजिए। वह एक हाथ उस व्यक्ति के कंधे पर रखता है जिसे ठेस पहुँची है और दूसरा हाथ उस पर जिसने ठेस पहुँचाई है, और इस प्रकार दोनों को फिर से मिला देता है। यीशु परमेश्वर और हमारे बीच वही मध्यस्थ हैं (1 तीमुथियुस 2:5)। यीशु हमें उद्धार देने में सक्षम है क्योंकि वह परमेश्वर के साथ एक है और हमारे साथ भी एक है।
परमेश्वर मनुष्य कैसे बना, यह चमत्कार एक अगम्य रहस्य है, परन्तु यही बात बाइबल में यीशु के विषय में बताई गई बाकी सभी बातों को समझने योग्य बनाती है। यदि परमेश्वर यीशु में मनुष्य बना, तो उसके दावे, उसके चमत्कार और उसका पुनरुत्थान आश्चर्य की बात नहीं होने चाहिए। अवतार ही वह रहस्य है जो बाकी सब बातों को स्पष्ट करता है।
चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न
1- यह सुनकर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी कि यीशु का जन्म एक कुंवारी माता से हुआ था?
2- स्वर्गदूतों ने कहा कि यीशु का जन्म सभी लोगों के लिए बड़ी खुशी का शुभ समाचार है। क्या यह आपको भी शुभ समाचार लगता है?
3- यीशु के प्रति लोगों में अभी भी मतभेद हैं। आपने उनके बारे में क्या-क्या प्रतिक्रियाएं देखी हैं?
4- क्या आपको यीशु के बारे में अपने दिल में तनाव या विभाजन महसूस होता है? आपको क्या लगता है कि ऐसा क्यों हो सकता है?
5- क्या आपको लगता है कि यीशु को आपके जीवन पर शासन करने का अधिकार है? क्यों या क्यों नहीं?





