तेरा नाम पवित्र माना जाए

“प्रभु की प्रार्थना” में पहली विनती यह नहीं है कि…
Day 4

“प्रभु की प्रार्थना” में पहली विनती यह नहीं है कि हमारी आवश्यकताएँ पूरी हों, बल्कि यह है कि परमेश्वर के नाम का आदर किया जाए। जब हम प्रार्थना करते हैं, “तेरा नाम पवित्र माना जाए,” तब हम यह माँगते हैं कि जैसे स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना, महिमा और आदर होता है, वैसे ही पृथ्वी पर भी हो।

स्वर्ग “प्रभु की प्रार्थना” की पहली तीन विनतियों को घेरे हुए है: “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 6:9–10)। इनमें से प्रत्येक विनती हमारे मन को इस ओर उठाती है कि स्वर्ग में सब बातें कैसी हैं।

अभी इसी समय स्वर्ग में स्वर्गदूत पुकार रहे हैं: “सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है; सारी पृथ्वी उसकी महिमा से भरपूर है!” (यशायाह 6:3)। और स्वर्ग का हर प्राणी यह कहते हुए सम्मिलित होता है,

“जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेम्ने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!” प्रकाशितवाक्य 5:13   

स्वर्ग निरंतर आराधना से भरा हुआ है, जहाँ परमेश्वर के नाम का आदर और महिमा की जाती है। परन्तु पृथ्वी की ओर देखकर परमेश्वर कहता है, “निरंतर दिन भर मेरे नाम की निन्दा होती रहती है” (यशायाह 52:5)।

पृथ्वी का दृश्य स्वर्ग के दृश्य से बहुत भिन्न है, और इसी बड़े अंतर के बीच यीशु हमें

“प्रभु की प्रार्थना” की पहली विनती करने के लिए बुलाता है: “हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए।” जैसे स्वर्ग में तेरे नाम का आदर और महिमा होती है, वैसे ही पृथ्वी पर भी हो। 

जब हम यह प्रार्थना करते हैं, तब हम परमेश्वर से विनती करते हैं कि वह इस प्रकार कार्य करे कि इस संसार के लोग उसे सब से बढ़कर मूल्यवान जानें। “लोगों को तुझ से प्रेम करने, तुझ पर भरोसा रखने और तेरी आज्ञा मानने के लिए ले आ। यह कार्य हर स्थान में कर, और इस प्रार्थना का उत्तर मुझ से आरम्भ कर।” 

 

चिंतन के लिए प्रश्न

क्या आप अभी इस विनती को अपने स्वर्गीय पिता के सामने प्रार्थना के रूप में रखना चाहेंगे?

Series :கர்த்தருடைய ஜெபத்தில் இயேசுவோடு 30 நாட்கள்

तेरा नाम पवित्र माना जाए

“प्रभु की प्रार्थना” में पहली विनती यह नहीं है कि हमारी आवश्यकताएँ पूरी हों, बल्कि यह है कि परमेश्वर के नाम का आदर किया जाए। जब हम प्रार्थना करते हैं,…
Day 4

“प्रभु की प्रार्थना” में पहली विनती यह नहीं है कि हमारी आवश्यकताएँ पूरी हों, बल्कि यह है कि परमेश्वर के नाम का आदर किया जाए। जब हम प्रार्थना करते हैं, “तेरा नाम पवित्र माना जाए,” तब हम यह माँगते हैं कि जैसे स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना, महिमा और आदर होता है, वैसे ही पृथ्वी पर भी हो।

स्वर्ग “प्रभु की प्रार्थना” की पहली तीन विनतियों को घेरे हुए है: “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 6:9–10)। इनमें से प्रत्येक विनती हमारे मन को इस ओर उठाती है कि स्वर्ग में सब बातें कैसी हैं।

अभी इसी समय स्वर्ग में स्वर्गदूत पुकार रहे हैं: “सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है; सारी पृथ्वी उसकी महिमा से भरपूर है!” (यशायाह 6:3)। और स्वर्ग का हर प्राणी यह कहते हुए सम्मिलित होता है,

“जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेम्ने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!” प्रकाशितवाक्य 5:13   

स्वर्ग निरंतर आराधना से भरा हुआ है, जहाँ परमेश्वर के नाम का आदर और महिमा की जाती है। परन्तु पृथ्वी की ओर देखकर परमेश्वर कहता है, “निरंतर दिन भर मेरे नाम की निन्दा होती रहती है” (यशायाह 52:5)।

पृथ्वी का दृश्य स्वर्ग के दृश्य से बहुत भिन्न है, और इसी बड़े अंतर के बीच यीशु हमें

“प्रभु की प्रार्थना” की पहली विनती करने के लिए बुलाता है: “हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए।” जैसे स्वर्ग में तेरे नाम का आदर और महिमा होती है, वैसे ही पृथ्वी पर भी हो। 

जब हम यह प्रार्थना करते हैं, तब हम परमेश्वर से विनती करते हैं कि वह इस प्रकार कार्य करे कि इस संसार के लोग उसे सब से बढ़कर मूल्यवान जानें। “लोगों को तुझ से प्रेम करने, तुझ पर भरोसा रखने और तेरी आज्ञा मानने के लिए ले आ। यह कार्य हर स्थान में कर, और इस प्रार्थना का उत्तर मुझ से आरम्भ कर।” 

 

चिंतन के लिए प्रश्न

क्या आप अभी इस विनती को अपने स्वर्गीय पिता के सामने प्रार्थना के रूप में रखना चाहेंगे?

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