Posts by Ebe Lanster

परमेश्वर के नाम की महिमा के लिए

Day 31
हे हमारे स्वर्गीय पिता, हम तेरे पवित्र नाम को ऊँचा उठाते हैं। जो स्वर्गदूत तेरे चारों ओर हैं, वे पुकारकर कहते हैं, “पवित्र, पवित्र, पवित्र,” और हम भी आनन्दपूर्वक उनके…

परमेश्वर का अन्तिम छुटकारा

Day 30
परमेश्वर ने प्रत्येक विश्वासी से एक महिमामय भविष्य की प्रतिज्ञा की है। वह एक नई सृष्टि होगी, जहाँ धार्मिकता का निवास होगा। उस घर में परमेश्वर स्वयं हमारे साथ रहेगा,…

जब आप असफल हो जाते हैं तब परमेश्वर का छुटकारा

Day 29
पुनःस्थापित करने वाला अनुग्रह वह कृपा है जो परमेश्वर हमारे असफल हो जाने पर हम पर करता है। जिस रात यीशु पकड़वाया गया, उसने अपने चेलों से कहा, “जागते रहो…

जब आप परीक्षा में पड़ते हैं तब परमेश्वर का छुटकारा

Day 27
जब हम प्रार्थना करते हैं, “हमें परीक्षा में न डाल,” तब परमेश्वर इस प्रार्थना का उत्तर अपने विशेष अनुग्रह के द्वारा देता है। यह उसका वह अनुग्रह है जो वह…

संसार में परमेश्वर का छुटकारा

Day 26
जब हम यह प्रार्थना करते हैं, “परन्तु बुराई से बचा,” तब परमेश्वर हमारी प्रार्थना का उत्तर अपने सामान्य अनुग्रह के द्वारा देता है। यह उसका वह अनुग्रह है जो वह…

हमें बुराई से बचा

Day 25
मसीही जीवन दो मोर्चों पर लड़ी जाने वाली एक लड़ाई है। एक ओर हमारे भीतर छिपी हुई परीक्षाएँ हैं, और दूसरी ओर हमारे चारों ओर फैली हुई बुराइयाँ। हमारे प्रभु…

हम दूसरों को कैसे क्षमा कर सकते हैं?

Day 24
परमेश्वर से क्षमा प्राप्त करने और दूसरों को क्षमा देने के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध “हम” और “हमारे” शब्दों में दिखाई देता है। यीशु ने हमें यह…

हमें क्षमा कैसे मिल सकती है?

Day 23
एक पवित्र और न्यायी परमेश्वर हमारे द्वारा बार-बार उसकी आज्ञाओं का पालन करने में की गई असफलता को कैसे क्षमा कर सकता है? यीशु ने पूर्ण प्रेम का जीवन जीया…

परमेश्वर के साथ संगति को पुनर्स्थापित करो

Day 22
कितने ही अनुशासित क्यों न हों, ऐसा कभी नहीं होगा कि आप पूरी तरह हर पाप से मुक्त हो जाएँ। पाप हमारे हृदयों में छिपा रहता है, और समय-समय पर…

जब दूसरे आपको निराश करते हैं

Day 21
परमेश्वर ने आपको दूसरों से प्रेम करने का दायित्व दिया है, और उसने दूसरों को भी आपसे प्रेम करने का दायित्व दिया है। परन्तु हम एक पतित संसार में रहते…

हमारे अपराध क्षमा कर

Day 20
“अपराध” और “अपराधियों” की भाषा का प्रयोग करके हमारे प्रभु यह स्पष्ट करते हैं कि हम में से प्रत्येक व्यक्ति सम्बन्धों के ऐसे जाल में जीवन बिताता है जिसमें हमारे…