परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा

परमेश्वर की इच्छा के विषय में हम जिस तीसरे अर्थ में बात करते हैं, उसे परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा कहा जा सकता है। यह परमेश्वर की गुप्त इच्छा से बहुत भिन्न है, क्योंकि परमेश्वर ने इसे बाइबल में प्रकट कर दिया है। और यह परमेश्वर की पहचानी हुई इच्छा से भी भिन्न है, क्योंकि परमेश्वर के वचन को कभी परखने की आवश्यकता नहीं होती।
हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा इस महान आज्ञा में प्रकट की गई है:
और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना…तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।”
मरकुस 12:30–31
हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा महान आदेश में प्रकट की गई है:
“इसलिए तुम जाओ, और सब जातियों को चेला बनाओ।”
मत्ती 28:19
हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा दस आज्ञाओं में भी प्रकट की गई है:
“तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना… तू चोरी न करना… तू अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना… तू लालच न करना।”
निर्गमन 20:3, 15, 16, 17
परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा का पालन करना सदैव हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। परमेश्वर हमें उन बातों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराएगा जिन्हें उसने गुप्त रखा है। परन्तु वह हमें उन बातों के लिए अवश्य उत्तरदायी ठहराएगा जिन्हें उसने प्रकट किया है।
जब आप अपने आप से कहते हैं, “मैं परमेश्वर की इच्छा जानना चाहता हूँ,” तो अपने आप को यह स्मरण दिलाइए कि परमेश्वर की इच्छा यह है कि आप वैसा जीवन जिएँ जैसा उसने बाइबल में बताया है। और जहाँ तक अन्य बातों का प्रश्न है, वहाँ आप जितना संभव हो उतना बुद्धिमानी और समझदारी से निर्णय लें।
हमें परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए?
जहाँ परमेश्वर ने अपने वचन में स्पष्ट रूप से बात की है, वहाँ आपको यह पूछने की आवश्यकता नहीं कि दूसरे लोग क्या सोचते हैं, और न ही यह जाँचने की कि परमेश्वर की कही हुई बात आपके अनुभव से मेल खाती है या नहीं। परमेश्वर ने जो कुछ प्रकट किया है, वह सदैव आपके परम हित के लिए है। इसलिए जब परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा और आपकी अपनी इच्छाएँ अलग-अलग दिशाओं में खींचें, तो परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह उसकी आज्ञा मानने में आपकी सहायता करे, ताकि उसकी इच्छा पूरी हो सके।
चिंतन के लिए प्रश्न
क्या आप अपने जीवन में ऐसी किसी एक बात की पहचान कर सकते हैं जहाँ परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा और आपकी अपनी इच्छाएँ एक-दूसरे के विरोध में हैं?
परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा

परमेश्वर की इच्छा के विषय में हम जिस तीसरे अर्थ में बात करते हैं, उसे परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा कहा जा सकता है। यह परमेश्वर की गुप्त इच्छा से बहुत भिन्न है, क्योंकि परमेश्वर ने इसे बाइबल में प्रकट कर दिया है। और यह परमेश्वर की पहचानी हुई इच्छा से भी भिन्न है, क्योंकि परमेश्वर के वचन को कभी परखने की आवश्यकता नहीं होती।
हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा इस महान आज्ञा में प्रकट की गई है:
और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना…तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।”
मरकुस 12:30–31
हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा महान आदेश में प्रकट की गई है:
“इसलिए तुम जाओ, और सब जातियों को चेला बनाओ।”
मत्ती 28:19
हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा दस आज्ञाओं में भी प्रकट की गई है:
“तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना… तू चोरी न करना… तू अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना… तू लालच न करना।”
निर्गमन 20:3, 15, 16, 17
परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा का पालन करना सदैव हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। परमेश्वर हमें उन बातों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराएगा जिन्हें उसने गुप्त रखा है। परन्तु वह हमें उन बातों के लिए अवश्य उत्तरदायी ठहराएगा जिन्हें उसने प्रकट किया है।
जब आप अपने आप से कहते हैं, “मैं परमेश्वर की इच्छा जानना चाहता हूँ,” तो अपने आप को यह स्मरण दिलाइए कि परमेश्वर की इच्छा यह है कि आप वैसा जीवन जिएँ जैसा उसने बाइबल में बताया है। और जहाँ तक अन्य बातों का प्रश्न है, वहाँ आप जितना संभव हो उतना बुद्धिमानी और समझदारी से निर्णय लें।
हमें परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए?
जहाँ परमेश्वर ने अपने वचन में स्पष्ट रूप से बात की है, वहाँ आपको यह पूछने की आवश्यकता नहीं कि दूसरे लोग क्या सोचते हैं, और न ही यह जाँचने की कि परमेश्वर की कही हुई बात आपके अनुभव से मेल खाती है या नहीं। परमेश्वर ने जो कुछ प्रकट किया है, वह सदैव आपके परम हित के लिए है। इसलिए जब परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा और आपकी अपनी इच्छाएँ अलग-अलग दिशाओं में खींचें, तो परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह उसकी आज्ञा मानने में आपकी सहायता करे, ताकि उसकी इच्छा पूरी हो सके।
चिंतन के लिए प्रश्न
क्या आप अपने जीवन में ऐसी किसी एक बात की पहचान कर सकते हैं जहाँ परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा और आपकी अपनी इच्छाएँ एक-दूसरे के विरोध में हैं?






