12. विश्वास – शिक्षण

सुसमाचार में एक ऐसे अवसर का वर्णन है जब यीशु अपने चेलों के साथ एक नाव में चढ़े और सो गए। झील पर एक बड़ा तूफ़ान आया और नाव पानी से भरने लगी।
चेलों ने यीशु को जगाया और कहा, “स्वामी! स्वामी! हम नाश हुए जाते हैं!” (लूका 8:24)। यीशु ने आँधी और लहरों को डाँटा, और वे थम गईं, और बड़ी शान्ति हो गई। तब यीशु ने अपने चेलों से कहा, “तुम्हारा विश्वास कहाँ था?” (पद 25)। यीशु उनके विश्वास की वास्तविकता पर प्रश्न नहीं कर रहे थे। वे यह पूछ रहे थे कि उन्होंने अपने विश्वास का प्रयोग उस परिस्थिति में क्यों नहीं किया जिसमें वे थे।
विश्वास का प्रयोग करना आवश्यक है; यह अपने आप कार्य नहीं करता। आपके घर का हीटिंग सिस्टम थर्मोस्टेट पर काम करता है। आप जिस तापमान को बनाए रखना चाहते हैं, उसके अनुसार आप थर्मोस्टेट को सेट करते हैं; और जब तापमान उस स्तर से नीचे जाता है, तो वह अपने आप चालू हो जाता है।
परन्तु विश्वास अपने आप कार्य नहीं करता; इसमें जानबूझकर किया गया ऐसा सहभाग होता है, जिसमें आप अभी जिस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, उसमें यीशु पर भरोसा करते हैं।
विश्वास शरीर की उस मांसपेशी की तरह है जो इस्तेमाल करने पर मजबूत होती जाती है। अगर आपका पैर टूट जाए, तो मांसपेशियां कमजोर हो जाएंगी क्योंकि उनका व्यायाम नहीं हो रहा है। मांसपेशियाँ तब मजबूत होती हैं जब उन्हें खींचा जाता है, और विश्वास तब बढ़ता है जब उसे उन विशेष परिस्थितियों में प्रयोग किया जाता है जहाँ आपको परमेश्वर के प्रकट किए हुए वादों पर विश्वास करना और उसकी छिपी हुई योजनाओं पर भरोसा रखना होता है।
विश्वास क्या है
विश्वास में दो तत्व सम्मिलित होते हैं। पहला है यीशु पर विश्वास करना, और दूसरा है यीशु पर भरोसा रखना; और ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
कभी-कभी “विश्वास करना” का अर्थ यह होता है कि किसी बात को सत्य मानना। याकूब कहता है कि, “दुष्टात्मा भी विश्वास रखते, और थरथराते हैं!” (याकूब 2:19)। दुष्टात्माएँ जानती हैं कि यीशु मरे हुओं में से जी उठे हैं, और वे इसके कारण काँपती हैं; परन्तु विश्वास केवल कुछ बातों को सत्य मान लेने से अधिक है। विश्वास में उस पर भरोसा करना भी सम्मिलित है, जिस पर हम विश्वास करने आए हैं।
हम विश्वास का अभ्यास इस प्रकार करते हैं कि जो परमेश्वर ने प्रकट किया है उस पर विश्वास करें, और जो उसने गुप्त रखा है उस पर भरोसा करें (व्यवस्थाविवरण 29:29)। परमेश्वर ने अपने पुत्र को प्रकट किया है, और उसने अपने वादों को भी प्रकट किया है। परन्तु बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर ने गुप्त रखा है। हम नहीं जानते कि कल क्या लाएगा। परन्तु जो कुछ उसने प्रकट किया है, उस पर विश्वास करते हुए हम उस पर उन बातों के लिए भी भरोसा रखते हैं जिन्हें उसने छिपा रखा है। परमेश्वर ने कहा है, “मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा” (इब्रानियों 13:5)। विश्वास कहता है कि मैं कल के लिए परमेश्वर पर भरोसा कर सकता हूँ, क्योंकि मैं उस प्रतिज्ञा पर विश्वास करता हूँ जो उसने आज दी है।
विश्वास क्या करता है
विश्वास एक जीवित वृक्ष के समान है, जो फल से लदा हुआ है।
- विश्वास आपकी समझ को खोल देता है।
विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। (इब्रानियों 11:3) - विश्वास आपको दूसरों के भले के लिए कार्य करने की ओर ले जाएगा।
विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, चेतावनी पाकर भक्ति के साथ अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया। (इब्रानियों 11:7) - विश्वास आपको आज्ञाकारिता की ओर ले जाएगा।
विश्वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेनेवाला था; और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ। (इब्रानियों 11:8) - विश्वास आपको आशा प्रदान करेगा।
वे एक उत्तम अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं। (इब्रानियों 11:16) - विश्वास दूसरों के लिए आशीष लाएगा।
विश्वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आनेवाली बातों के विषय में आशीष दी। (इब्रानियों 11:20) - विश्वास आपको आराधना की ओर ले जाएगा।
विश्वास ही से याकूब ने मरते समय यूसुफ के दोनों पुत्रों में से एक-एक को आशीष दी, और अपनी लाठी के सिरे पर सहारा लेकर दण्डवत् किया। (इब्रानियों 11:21)
विश्वास ये सब बातें क्यों करता है? उसका जीवन और सामर्थ्य कहाँ से आता है?
विश्वास हमें यीशु के साथ एक करता है।
विश्वास हमें यीशु मसीह के साथ जोड़ता है, जिससे हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है। यीशु ने कहा,
“मैं दाखलता हूँ : तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” (यूहन्ना 15:5)
बाइबल एक विश्वास करने वाले को ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित करती है जो मसीह में है।
इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है : पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं। (2 कुरिन्थियों 5:17)
यह हमें यह भी बताता है कि मसीह हम में वास करता है।
मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है; और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिये अपने आप को दे दिया। (गलतियों 2:20)
विश्वास वह साधन है जिसके द्वारा हम यीशु मसीह से जुड़ जाते हैं, ताकि उसका जीवन हम में प्रवाहित हो।
बाइबल इस एकता का वर्णन करने के लिए विवाह की उपमा का उपयोग करती है।
“इस कारण मनुष्य अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।” यह भेद तो बड़ा है, पर मैं यहाँ मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ। (इफिसियों 5:31-32)
विवाह आपके जीवन को बदल देगा, और आपका जीवन कैसे बदलेगा यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किससे विवाह करते हैं। विश्वास हमें यीशु से जोड़ता है और हमें उनके साथ एक कर देता है। यीशु के लिए इस एकता का अर्थ था कि वह एक गौशाला में जन्म लेना, परीक्षाओं को सहना, और हमारे पापों का बोझ उठाना। हमारे लिए, इस मिलन का अर्थ है उसके अटल प्रेम को, उसकी सिद्ध धार्मिकता को, और उसके पुनरुत्थान के जीवन को प्राप्त करना।
यदि आप इस मिलन का आनंद लेना चाहते हैं, तो आपके और यीशु मसीह के बीच सीधा संबंध होना चाहिए, और इस संबंध की दो शर्तें हैं:
एक यह कि यीशु आपको स्वीकार करें; दूसरी यह कि आप यीशु को स्वीकार करें।
विवाह समारोह में दूल्हे से पूछा जाता है: “क्या तुम इस स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करोगे?” फिर दुल्हन से पूछा जाता है: “क्या तुम इस पुरुष को अपने पति के रूप में स्वीकार करोगी?”
दो हजार वर्ष पहले यीशु से यह प्रश्न पूछा गया था: “क्या तुम उन सब बातों को अपने ऊपर लेने को तैयार हो जो पापियों के साथ एक होने में सम्मिलित हैं?”
और क्रूस पर, फैली हुई भुजाओं के साथ, यीशु ने उत्तर दिया: “मैं तैयार हूँ।”
अब पवित्र आत्मा, जो इस एकता को स्थापित करता है, आपसे पूछता है: क्या आप यीशु को अपने उद्धारकर्ता और अपने प्रभु के रूप में स्वीकार करेंगे? क्या आप उन सब बातों को त्याग देंगे जो उसे अप्रिय हैं, और जीवन भर केवल उसी के बने रहेंगे?
और विश्वास उत्तर देता है: “मैं तैयार हूँ।”
जैसा कि विवाह समारोह में होता है, “मैं तैयार हूँ” का उत्तर इससे अधिक सरल नहीं हो सकता; परन्तु ये प्रतिबद्धता के शब्द अपने महत्व में जीवन बदल देने वाले होते हैं।
चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न
1- विश्वास के वरदान पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या है?
2- आपने बाइबल से क्या सीखा है जिसके आधार पर आप विश्वास करने लगे हैं?
3- इस समय आपको अपने जीवन में सबसे ज्यादा किस बात पर विश्वास रखने की जरूरत है?
4- स्वयं पर विश्वास रखने और यीशु मसीह पर विश्वास रखने में क्या अंतर है?
5- जब यीशु क्रूस पर गए, तब उन्होंने हमारे प्रति एक प्रतिबद्धता दिखाई। क्या आपने स्वयं को उनके प्रति समर्पित किया है?
12. विश्वास – शिक्षण

सुसमाचार में एक ऐसे अवसर का वर्णन है जब यीशु अपने चेलों के साथ एक नाव में चढ़े और सो गए। झील पर एक बड़ा तूफ़ान आया और नाव पानी से भरने लगी।
चेलों ने यीशु को जगाया और कहा, “स्वामी! स्वामी! हम नाश हुए जाते हैं!” (लूका 8:24)। यीशु ने आँधी और लहरों को डाँटा, और वे थम गईं, और बड़ी शान्ति हो गई। तब यीशु ने अपने चेलों से कहा, “तुम्हारा विश्वास कहाँ था?” (पद 25)। यीशु उनके विश्वास की वास्तविकता पर प्रश्न नहीं कर रहे थे। वे यह पूछ रहे थे कि उन्होंने अपने विश्वास का प्रयोग उस परिस्थिति में क्यों नहीं किया जिसमें वे थे।
विश्वास का प्रयोग करना आवश्यक है; यह अपने आप कार्य नहीं करता। आपके घर का हीटिंग सिस्टम थर्मोस्टेट पर काम करता है। आप जिस तापमान को बनाए रखना चाहते हैं, उसके अनुसार आप थर्मोस्टेट को सेट करते हैं; और जब तापमान उस स्तर से नीचे जाता है, तो वह अपने आप चालू हो जाता है।
परन्तु विश्वास अपने आप कार्य नहीं करता; इसमें जानबूझकर किया गया ऐसा सहभाग होता है, जिसमें आप अभी जिस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, उसमें यीशु पर भरोसा करते हैं।
विश्वास शरीर की उस मांसपेशी की तरह है जो इस्तेमाल करने पर मजबूत होती जाती है। अगर आपका पैर टूट जाए, तो मांसपेशियां कमजोर हो जाएंगी क्योंकि उनका व्यायाम नहीं हो रहा है। मांसपेशियाँ तब मजबूत होती हैं जब उन्हें खींचा जाता है, और विश्वास तब बढ़ता है जब उसे उन विशेष परिस्थितियों में प्रयोग किया जाता है जहाँ आपको परमेश्वर के प्रकट किए हुए वादों पर विश्वास करना और उसकी छिपी हुई योजनाओं पर भरोसा रखना होता है।
विश्वास क्या है
विश्वास में दो तत्व सम्मिलित होते हैं। पहला है यीशु पर विश्वास करना, और दूसरा है यीशु पर भरोसा रखना; और ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
कभी-कभी “विश्वास करना” का अर्थ यह होता है कि किसी बात को सत्य मानना। याकूब कहता है कि, “दुष्टात्मा भी विश्वास रखते, और थरथराते हैं!” (याकूब 2:19)। दुष्टात्माएँ जानती हैं कि यीशु मरे हुओं में से जी उठे हैं, और वे इसके कारण काँपती हैं; परन्तु विश्वास केवल कुछ बातों को सत्य मान लेने से अधिक है। विश्वास में उस पर भरोसा करना भी सम्मिलित है, जिस पर हम विश्वास करने आए हैं।
हम विश्वास का अभ्यास इस प्रकार करते हैं कि जो परमेश्वर ने प्रकट किया है उस पर विश्वास करें, और जो उसने गुप्त रखा है उस पर भरोसा करें (व्यवस्थाविवरण 29:29)। परमेश्वर ने अपने पुत्र को प्रकट किया है, और उसने अपने वादों को भी प्रकट किया है। परन्तु बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर ने गुप्त रखा है। हम नहीं जानते कि कल क्या लाएगा। परन्तु जो कुछ उसने प्रकट किया है, उस पर विश्वास करते हुए हम उस पर उन बातों के लिए भी भरोसा रखते हैं जिन्हें उसने छिपा रखा है। परमेश्वर ने कहा है, “मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा” (इब्रानियों 13:5)। विश्वास कहता है कि मैं कल के लिए परमेश्वर पर भरोसा कर सकता हूँ, क्योंकि मैं उस प्रतिज्ञा पर विश्वास करता हूँ जो उसने आज दी है।
विश्वास क्या करता है
विश्वास एक जीवित वृक्ष के समान है, जो फल से लदा हुआ है।
- विश्वास आपकी समझ को खोल देता है।
विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। (इब्रानियों 11:3) - विश्वास आपको दूसरों के भले के लिए कार्य करने की ओर ले जाएगा।
विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, चेतावनी पाकर भक्ति के साथ अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया। (इब्रानियों 11:7) - विश्वास आपको आज्ञाकारिता की ओर ले जाएगा।
विश्वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेनेवाला था; और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ। (इब्रानियों 11:8) - विश्वास आपको आशा प्रदान करेगा।
वे एक उत्तम अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं। (इब्रानियों 11:16) - विश्वास दूसरों के लिए आशीष लाएगा।
विश्वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आनेवाली बातों के विषय में आशीष दी। (इब्रानियों 11:20) - विश्वास आपको आराधना की ओर ले जाएगा।
विश्वास ही से याकूब ने मरते समय यूसुफ के दोनों पुत्रों में से एक-एक को आशीष दी, और अपनी लाठी के सिरे पर सहारा लेकर दण्डवत् किया। (इब्रानियों 11:21)
विश्वास ये सब बातें क्यों करता है? उसका जीवन और सामर्थ्य कहाँ से आता है?
विश्वास हमें यीशु के साथ एक करता है।
विश्वास हमें यीशु मसीह के साथ जोड़ता है, जिससे हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है। यीशु ने कहा,
“मैं दाखलता हूँ : तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” (यूहन्ना 15:5)
बाइबल एक विश्वास करने वाले को ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित करती है जो मसीह में है।
इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है : पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं। (2 कुरिन्थियों 5:17)
यह हमें यह भी बताता है कि मसीह हम में वास करता है।
मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है; और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिये अपने आप को दे दिया। (गलतियों 2:20)
विश्वास वह साधन है जिसके द्वारा हम यीशु मसीह से जुड़ जाते हैं, ताकि उसका जीवन हम में प्रवाहित हो।
बाइबल इस एकता का वर्णन करने के लिए विवाह की उपमा का उपयोग करती है।
“इस कारण मनुष्य अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।” यह भेद तो बड़ा है, पर मैं यहाँ मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ। (इफिसियों 5:31-32)
विवाह आपके जीवन को बदल देगा, और आपका जीवन कैसे बदलेगा यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किससे विवाह करते हैं। विश्वास हमें यीशु से जोड़ता है और हमें उनके साथ एक कर देता है। यीशु के लिए इस एकता का अर्थ था कि वह एक गौशाला में जन्म लेना, परीक्षाओं को सहना, और हमारे पापों का बोझ उठाना। हमारे लिए, इस मिलन का अर्थ है उसके अटल प्रेम को, उसकी सिद्ध धार्मिकता को, और उसके पुनरुत्थान के जीवन को प्राप्त करना।
यदि आप इस मिलन का आनंद लेना चाहते हैं, तो आपके और यीशु मसीह के बीच सीधा संबंध होना चाहिए, और इस संबंध की दो शर्तें हैं:
एक यह कि यीशु आपको स्वीकार करें; दूसरी यह कि आप यीशु को स्वीकार करें।
विवाह समारोह में दूल्हे से पूछा जाता है: “क्या तुम इस स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करोगे?” फिर दुल्हन से पूछा जाता है: “क्या तुम इस पुरुष को अपने पति के रूप में स्वीकार करोगी?”
दो हजार वर्ष पहले यीशु से यह प्रश्न पूछा गया था: “क्या तुम उन सब बातों को अपने ऊपर लेने को तैयार हो जो पापियों के साथ एक होने में सम्मिलित हैं?”
और क्रूस पर, फैली हुई भुजाओं के साथ, यीशु ने उत्तर दिया: “मैं तैयार हूँ।”
अब पवित्र आत्मा, जो इस एकता को स्थापित करता है, आपसे पूछता है: क्या आप यीशु को अपने उद्धारकर्ता और अपने प्रभु के रूप में स्वीकार करेंगे? क्या आप उन सब बातों को त्याग देंगे जो उसे अप्रिय हैं, और जीवन भर केवल उसी के बने रहेंगे?
और विश्वास उत्तर देता है: “मैं तैयार हूँ।”
जैसा कि विवाह समारोह में होता है, “मैं तैयार हूँ” का उत्तर इससे अधिक सरल नहीं हो सकता; परन्तु ये प्रतिबद्धता के शब्द अपने महत्व में जीवन बदल देने वाले होते हैं।
चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न
1- विश्वास के वरदान पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या है?
2- आपने बाइबल से क्या सीखा है जिसके आधार पर आप विश्वास करने लगे हैं?
3- इस समय आपको अपने जीवन में सबसे ज्यादा किस बात पर विश्वास रखने की जरूरत है?
4- स्वयं पर विश्वास रखने और यीशु मसीह पर विश्वास रखने में क्या अंतर है?
5- जब यीशु क्रूस पर गए, तब उन्होंने हमारे प्रति एक प्रतिबद्धता दिखाई। क्या आपने स्वयं को उनके प्रति समर्पित किया है?




