8. क्रूस पर चढ़ाया गया – शिक्षण

यीशु को रोमी सैनिकों ने गिरफ़्तार कर लिया, और वे तलवारों तथा लाठियों से लैस एक भीड़ से घिरे हुए थे। फिर एक ही रात के दौरान उन्हें घसीटकर एक…
8. क्रूस पर चढ़ाया गया - शिक्षण

यीशु को रोमी सैनिकों ने गिरफ़्तार कर लिया, और वे तलवारों तथा लाठियों से लैस एक भीड़ से घिरे हुए थे। फिर एक ही रात के दौरान उन्हें घसीटकर एक मुकदमे से दूसरे मुकदमे में ले जाया गया—महायाजक के सामने, राजा के सामने, और पोंतियुस पीलातुस के सामने। रोमी राज्यपाल होने के नाते पीलातुस ने यीशु को निर्दोष ठहराया, परन्तु भीड़ के दबाव में आकर उसने यीशु को कोड़े लगवाए। जब भीड़ इससे भी संतुष्ट नहीं हुई, तो उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिये सौंप दिया (यूहन्ना 19:16)।

उस क्रूस पर जो कुछ हो रहा था, उसे देखकर स्वर्गदूतों के मन में क्या विचार आए होंगे? जब उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को संसार में जन्म लेते हुए मनुष्य का शरीर धारण करते देखा, तब वे आश्चर्य से भर उठे होंगे। अब वे उसी शरीर को कोड़ों से विदीर्ण होते हुए, उसके सिर में काँटों का मुकुट धँसाया जाता हुआ, और उसके हाथों और पैरों में कीलें ठोकी जाती हुई देख रहे थे।

क्रूस पर मनुष्य के पाप ने अपनी पूरी भयावहता और सबसे भयानक अभिव्यक्ति प्रकट की। हमने परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन किया था। अब हम परमेश्वर के पुत्र को क्रूस पर चढ़ा रहे थे। यदि मानव इतिहास में कभी ऐसा क्षण था जब परमेश्वर का न्याय गिरना ही था, तो वह यही था।

यीशु जानते थे कि परमेश्वर का न्याय आने वाला है, परन्तु उन्होंने पुकारकर कहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34)। उनका अर्थ था, “यह उन पर न गिरे; इसे मुझ पर गिरने दे। उनके पापों के लिए अपने न्याय को मुझ पर ही गिरने दे।” यह सुसमाचार का सार है। यीशु ने हमारे पापों का दंड अपने ऊपर ले लिया, ताकि हमें क्षमा मिल सके।

यीशु की यह प्रार्थना, “पिता, इन्हें क्षमा कर,” हर उस व्यक्ति के पाप को ढाँक लेती है जो उनके पास आएगा। यदि यह उन लोगों के पापों को ढक सकती है जिन्होंने यीशु को क्रूस पर चढ़ाया था, तो यह आपके सभी पापों को भी ढक सकती है।

स्वर्ग के द्वार खुल गए हैं

यीशु के दोनों ओर दो चोर सूली पर लटके हुए थे। अपराध का जीवन जीते हुए, उन्होंने मानव न्याय को सहन किया था और अब वे उसकी कीमत चुका रहे थे। शीघ्र ही मृत्यु उनके कष्टों को समाप्त कर देगी, परन्तु उसके बाद वे परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेंगे, जहाँ उन्हें दिव्य न्याय का सामना करना होगा। उनकी स्थिति निराशाजनक प्रतीत होती थी।

दोनों ने भी भीड़ के साथ मिलकर यीशु का उपहास किया (मत्ती 27:44)। परन्तु जैसे-जैसे मृत्यु निकट आई, कुछ बदल गया। उनमें से एक को नया बोध हुआ कि वह शीघ्र ही परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेगा, और जबकि दूसरा चोर यीशु का अपमान करता रहा, इस व्यक्ति ने उसे डाँटा: “क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता?” उसने यीशु को यह प्रार्थना करते सुना था, “पिता, इन्हें क्षमा कर।” संभव है कि यीशु उसे भी क्षमा कर सकते थे।

तब उसने कहा, “हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।” उसने (यीशु) उससे कहा, “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।” (लूका 23:42-43)

स्वर्ग! इस मनुष्य ने अपना जीवन दुखद रूप से व्यर्थ कर दिया था, परन्तु यीशु ने उसे यह प्रतिज्ञा दी कि मृत्यु के माध्यम से वह तुरंत शुद्ध आनंद के जीवन में प्रवेश करेगा। अचानक यह मनुष्य, जो नरक के कगार पर था, यह पाया कि यीशु के कारण वह स्वर्ग के आनंद में प्रवेश करने वाला है। यीशु ने परमेश्वर की उपस्थिति और आशीष में लौटने का मार्ग खोल दिया—केवल उस चोर के लिए ही नहीं, बल्कि उन सब के लिए भी जो उन पर विश्वास करेंगे।

सूर्य का प्रकाश थम गया।

यीशु ने मनुष्यों के न्याय को सहा था। अब वह परमेश्वर के न्याय को सहने वाले थे, और जब वह अपने दुखों के केंद्र में प्रवेश कर रहे थे, तब परमेश्वर ने सूर्य को चमकने से रोक दिया: “लगभग दो पहर से तीसरे पहर तक सारे देश में अन्धियारा छाया रहा” (लूका 23:44)।

इन अंधकार के घंटों में यीशु ने हमारे अपराध का भार उठाया और परमेश्वर के क्रोध को सह लिया। उन्होंने यह सब अकेले सहा, अपने पिता के प्रेम की सांत्वना के बिना, और अपनी पीड़ा की गहराई में उन्होंने बड़े शब्द से पुकार कर कहा, “हे मेरे परमेश्‍वर, हे मेरे परमेश्‍वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मरकुस 15:34)।

परमेश्वर हमें बताते हैं कि उस भयानक अंधकार में यीशु क्या कर रहे थे:

वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ गया। (1 पतरस 2:24)

परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया,

वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया;

हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी,

कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ।

हम तो सब के सब भेड़ों के समान भटक गए थे;

हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया;

और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ

उसी पर लाद दिया। (यशायाह 53:5-6)

ये पवित्रशास्त्र और अन्य अनेक पद इस अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं कि परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा पापियों को अपने साथ मेल कराता है।

मृत्यु पराजित हुई

तीन घंटे के बाद अंधकार छंट गया। यीशु पर उंडेला गया न्याय पूर्ण हो चुका था और समाप्त हो गया था। न्याय संतुष्ट हो गया, और यीशु ने विजय के साथ पुकारकर कहा, “पूरा हुआ” (यूहन्ना 19:30)।

परमेश्वर के लोगों के उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था, वह सब पूरा हो चुका था: क्षमा प्रदान की गई, दोष दूर कर दिया गया, और उन सब के लिए स्वर्ग खोल दिया गया जो यीशु पर विश्वास करेंगे।

और यीशु ने बड़े शब्द से पुकार कर कहा, “हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।” और यह कहकर प्राण छोड़ दिए (लूका 23:46)। जब कोई व्यक्ति मरने के निकट होता है, तो उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है, यहाँ तक कि कोई भी मृत्यु के समय ऊँचे स्वर में नहीं बोलता। परन्तु यीशु ने ऐसा किया।

यीशु मृत्यु से पराजित नहीं हुए। उन्होंने कहा, “मैं अपना प्राण देता हूँ कि उसे फिर ले लूँ। कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन् मैं उसे आप ही देता हूँ। मुझे उसके देने का भी अधिकार है, और उसे फिर ले लेने का भी अधिकार है” (यूहन्ना 10:17-18)। यीशु का जीवन उससे छीना नहीं गया, बल्कि उसने स्वयं उसे दे दिया। उसने अपने आप को हमारे लिए दे दिया।

यीशु ने अपने सभी विश्वासियों के लिए मृत्यु का स्वरूप बदल दिया है। जब वह मरा, तब जो न्याय और दोष हमारे लिए ठहराया गया था, वह उस पर उंडेल दिया गया। “अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” (रोमियों 8:1)।

चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न

1- क्रूस पर यीशु की मृत्यु पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या है?

2- यीशु ने कहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर दो।” अगर आपको निर्दोष होते हुए भी क्रूस की पीड़ा और अपमान सहना पड़ता, तो आप क्या कहते?

3- आप किस चोर से सबसे अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं—वह चोर जो यीशु पर चिल्ला रहा था? या वह चोर जिसने यीशु से उसे याद रखने के लिए कहा? क्यों?

4- अगर आपका कोई दोस्त आपसे पूछे कि यीशु क्रूस पर क्यों मरे, तो आप उसे कैसे समझाएंगे?

5- क्या आपके जीवन में ऐसा कुछ है जो आपको यीशु की तरह आत्मविश्वास से मरने से रोक सकता है?

Series : बाइबल का अवलोकन

8. क्रूस पर चढ़ाया गया – शिक्षण

यीशु को रोमी सैनिकों ने गिरफ़्तार कर लिया, और वे तलवारों तथा लाठियों से लैस एक भीड़ से घिरे हुए थे। फिर एक ही रात के दौरान उन्हें घसीटकर एक…
8. क्रूस पर चढ़ाया गया - शिक्षण

यीशु को रोमी सैनिकों ने गिरफ़्तार कर लिया, और वे तलवारों तथा लाठियों से लैस एक भीड़ से घिरे हुए थे। फिर एक ही रात के दौरान उन्हें घसीटकर एक मुकदमे से दूसरे मुकदमे में ले जाया गया—महायाजक के सामने, राजा के सामने, और पोंतियुस पीलातुस के सामने। रोमी राज्यपाल होने के नाते पीलातुस ने यीशु को निर्दोष ठहराया, परन्तु भीड़ के दबाव में आकर उसने यीशु को कोड़े लगवाए। जब भीड़ इससे भी संतुष्ट नहीं हुई, तो उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिये सौंप दिया (यूहन्ना 19:16)।

उस क्रूस पर जो कुछ हो रहा था, उसे देखकर स्वर्गदूतों के मन में क्या विचार आए होंगे? जब उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को संसार में जन्म लेते हुए मनुष्य का शरीर धारण करते देखा, तब वे आश्चर्य से भर उठे होंगे। अब वे उसी शरीर को कोड़ों से विदीर्ण होते हुए, उसके सिर में काँटों का मुकुट धँसाया जाता हुआ, और उसके हाथों और पैरों में कीलें ठोकी जाती हुई देख रहे थे।

क्रूस पर मनुष्य के पाप ने अपनी पूरी भयावहता और सबसे भयानक अभिव्यक्ति प्रकट की। हमने परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन किया था। अब हम परमेश्वर के पुत्र को क्रूस पर चढ़ा रहे थे। यदि मानव इतिहास में कभी ऐसा क्षण था जब परमेश्वर का न्याय गिरना ही था, तो वह यही था।

यीशु जानते थे कि परमेश्वर का न्याय आने वाला है, परन्तु उन्होंने पुकारकर कहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34)। उनका अर्थ था, “यह उन पर न गिरे; इसे मुझ पर गिरने दे। उनके पापों के लिए अपने न्याय को मुझ पर ही गिरने दे।” यह सुसमाचार का सार है। यीशु ने हमारे पापों का दंड अपने ऊपर ले लिया, ताकि हमें क्षमा मिल सके।

यीशु की यह प्रार्थना, “पिता, इन्हें क्षमा कर,” हर उस व्यक्ति के पाप को ढाँक लेती है जो उनके पास आएगा। यदि यह उन लोगों के पापों को ढक सकती है जिन्होंने यीशु को क्रूस पर चढ़ाया था, तो यह आपके सभी पापों को भी ढक सकती है।

स्वर्ग के द्वार खुल गए हैं

यीशु के दोनों ओर दो चोर सूली पर लटके हुए थे। अपराध का जीवन जीते हुए, उन्होंने मानव न्याय को सहन किया था और अब वे उसकी कीमत चुका रहे थे। शीघ्र ही मृत्यु उनके कष्टों को समाप्त कर देगी, परन्तु उसके बाद वे परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेंगे, जहाँ उन्हें दिव्य न्याय का सामना करना होगा। उनकी स्थिति निराशाजनक प्रतीत होती थी।

दोनों ने भी भीड़ के साथ मिलकर यीशु का उपहास किया (मत्ती 27:44)। परन्तु जैसे-जैसे मृत्यु निकट आई, कुछ बदल गया। उनमें से एक को नया बोध हुआ कि वह शीघ्र ही परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेगा, और जबकि दूसरा चोर यीशु का अपमान करता रहा, इस व्यक्ति ने उसे डाँटा: “क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता?” उसने यीशु को यह प्रार्थना करते सुना था, “पिता, इन्हें क्षमा कर।” संभव है कि यीशु उसे भी क्षमा कर सकते थे।

तब उसने कहा, “हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।” उसने (यीशु) उससे कहा, “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।” (लूका 23:42-43)

स्वर्ग! इस मनुष्य ने अपना जीवन दुखद रूप से व्यर्थ कर दिया था, परन्तु यीशु ने उसे यह प्रतिज्ञा दी कि मृत्यु के माध्यम से वह तुरंत शुद्ध आनंद के जीवन में प्रवेश करेगा। अचानक यह मनुष्य, जो नरक के कगार पर था, यह पाया कि यीशु के कारण वह स्वर्ग के आनंद में प्रवेश करने वाला है। यीशु ने परमेश्वर की उपस्थिति और आशीष में लौटने का मार्ग खोल दिया—केवल उस चोर के लिए ही नहीं, बल्कि उन सब के लिए भी जो उन पर विश्वास करेंगे।

सूर्य का प्रकाश थम गया।

यीशु ने मनुष्यों के न्याय को सहा था। अब वह परमेश्वर के न्याय को सहने वाले थे, और जब वह अपने दुखों के केंद्र में प्रवेश कर रहे थे, तब परमेश्वर ने सूर्य को चमकने से रोक दिया: “लगभग दो पहर से तीसरे पहर तक सारे देश में अन्धियारा छाया रहा” (लूका 23:44)।

इन अंधकार के घंटों में यीशु ने हमारे अपराध का भार उठाया और परमेश्वर के क्रोध को सह लिया। उन्होंने यह सब अकेले सहा, अपने पिता के प्रेम की सांत्वना के बिना, और अपनी पीड़ा की गहराई में उन्होंने बड़े शब्द से पुकार कर कहा, “हे मेरे परमेश्‍वर, हे मेरे परमेश्‍वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मरकुस 15:34)।

परमेश्वर हमें बताते हैं कि उस भयानक अंधकार में यीशु क्या कर रहे थे:

वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ गया। (1 पतरस 2:24)

परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया,

वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया;

हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी,

कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ।

हम तो सब के सब भेड़ों के समान भटक गए थे;

हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया;

और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ

उसी पर लाद दिया। (यशायाह 53:5-6)

ये पवित्रशास्त्र और अन्य अनेक पद इस अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं कि परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा पापियों को अपने साथ मेल कराता है।

मृत्यु पराजित हुई

तीन घंटे के बाद अंधकार छंट गया। यीशु पर उंडेला गया न्याय पूर्ण हो चुका था और समाप्त हो गया था। न्याय संतुष्ट हो गया, और यीशु ने विजय के साथ पुकारकर कहा, “पूरा हुआ” (यूहन्ना 19:30)।

परमेश्वर के लोगों के उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था, वह सब पूरा हो चुका था: क्षमा प्रदान की गई, दोष दूर कर दिया गया, और उन सब के लिए स्वर्ग खोल दिया गया जो यीशु पर विश्वास करेंगे।

और यीशु ने बड़े शब्द से पुकार कर कहा, “हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।” और यह कहकर प्राण छोड़ दिए (लूका 23:46)। जब कोई व्यक्ति मरने के निकट होता है, तो उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है, यहाँ तक कि कोई भी मृत्यु के समय ऊँचे स्वर में नहीं बोलता। परन्तु यीशु ने ऐसा किया।

यीशु मृत्यु से पराजित नहीं हुए। उन्होंने कहा, “मैं अपना प्राण देता हूँ कि उसे फिर ले लूँ। कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन् मैं उसे आप ही देता हूँ। मुझे उसके देने का भी अधिकार है, और उसे फिर ले लेने का भी अधिकार है” (यूहन्ना 10:17-18)। यीशु का जीवन उससे छीना नहीं गया, बल्कि उसने स्वयं उसे दे दिया। उसने अपने आप को हमारे लिए दे दिया।

यीशु ने अपने सभी विश्वासियों के लिए मृत्यु का स्वरूप बदल दिया है। जब वह मरा, तब जो न्याय और दोष हमारे लिए ठहराया गया था, वह उस पर उंडेल दिया गया। “अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” (रोमियों 8:1)।

चिंतन और चर्चा के लिए प्रश्न

1- क्रूस पर यीशु की मृत्यु पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या है?

2- यीशु ने कहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर दो।” अगर आपको निर्दोष होते हुए भी क्रूस की पीड़ा और अपमान सहना पड़ता, तो आप क्या कहते?

3- आप किस चोर से सबसे अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं—वह चोर जो यीशु पर चिल्ला रहा था? या वह चोर जिसने यीशु से उसे याद रखने के लिए कहा? क्यों?

4- अगर आपका कोई दोस्त आपसे पूछे कि यीशु क्रूस पर क्यों मरे, तो आप उसे कैसे समझाएंगे?

5- क्या आपके जीवन में ऐसा कुछ है जो आपको यीशु की तरह आत्मविश्वास से मरने से रोक सकता है?